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शुक्रवार, 14 मार्च 2008

अटकन मटकन

फ़िर से यादआ गई एक और कविता। निर्मल प्रेम और त्याग की झलक इसमें दिखाती है, जब कहा जाता हैकि वह तो ख़ुद कच्ची सुपारी खाने के लिए तैयार है, जब कि उसे पकी सुपारी दी जायेगी। आप जानते होंगे, कच्ची सुपारी की तासीर। फ़िर भी, यह प्रस्ताव!

अटकन मटकन दही चटाकन

अए बेला तू वन जा

वन से कसैली (सुपारी) ला,

हम खाएब कच्चा-कच्चा

तोरा देबौ पक्का -पक्का

राजा बेटा अयिहें

पोखरी खनायिहें

पोखरी के भीड पर

अस्सी कौउअया

अंडा गिरे रेस में

मच्छ्ली के पेट में।

अजुआ रे अजुआ

ओह! मत पूछिए! बगैर सिर- पैर की भी कवितायें होती थीं, मगर क्या गज़ब की लयात्मकता केसाथ। तीन गोटियों के साथ हम एक दो सहेलियों जिसे हम खेल के लिए गोद्धा कहते, बैठ जाते। एक गोटी ऊपर उछलते और नीचे की बची सभी गोटियों को हमें उतनी देर में समेट लेना होता, जितनी देर में उछली गई गोटी नीचे आती। जो चुका, उसका मौका भी चूका। देखिए, ज़रा इसकी ले और झूमी इसमें, फ़िर हमें बताइए। पहले का 'एक दो तीन, चार पांच छे सात...' जैसे गाने कहैं थे? इनकी जगह हम इससे बड़ी ज़ल्दी गिनती सीख गए थे।

अजुआ रे अजुआ
बाभन बजुआ
तिल्लक तेली
चार करेली
पंचे पूरी
छठे छियालीस
सत्ते सतानबे
अट्ठे गंगाजल
नब्बे निनानबे
दस भाई फुक्का
एगारह चूडी कांच के
बारह बेटी बाप के
तेलिया तेलाई के
चौदह मूडी भाई के
नाच करे भौजाई के