इस बार एक कविता बाबा नागार्जुन की। इसे मैंने अपनी बड़ी बिटिया तोषी को सिखाया था, जब वह ६ या ७ साल की थी। उसने अपने स्कूल में इसे सुनाया था। इस कविता की खासियत यह है की यह हर उम्र, हर वक़्त, हर काल के लिए माजून हाय। इस कविता की एक और खासियत है की इसमे किसी भी विराम चिन्ह का बाबा ने प्रयोग नही किया है। उनका कहना है की यह कविता समय व् काल से परे है। विराम चिन्ह इसे एक ठहराव देता, जबकि यह स्थिति एक कालातीत सत्य है। यहाँ इसे बिना विराम चिन्ह के ही प्रस्तुत किया जा रहा है, बाबा के प्रति अपनी श्रद्धा प्रकट करते हुए। आप अभी भी अपनी पिटारी खोलें और कवितायें bhejen gonujha.jha@gmail.com पर ।
बहुत दिनों तक चूल्हा रोया चक्की रही उदास
बहुत दिनों तक कानी कुतिया सोई उसके पास
बहुत दिनों तक लगी भीत पर छिपकलियों की गश्त
बहुत दिनों तक चूहों की भी हालत रही शिकस्त
दाने आए घर के अन्दर बहुत दिनों के बाद
धुंआ उठा आँगन के ऊपर बहुत दिनों के बाद
कव्वों ने खुजलाई पांखें बहुत दिनों के बाद
चमक उठीं घर भर की आँखें बहुत दिनों के बाद
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Monday, November 24, 2008
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