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गुरुवार, 26 जून 2014

सूर्योदय

इस ब्लॉग का उद्देश्य बालोपयोगी कविताएं देना है, ताकि स्कूल जानेवाले हर उम्र के बच्चे अपनी ज़रूरत के मुताबिक इसमें से कविताएं ले सकें। लोगों की सहभागिता बढ़ाने के लिए हमने उनकी यादों से कविताएं मांगी। बच्चों से स्कूलों में पढ़ाई जानेवाली कविताएं। आपसे अनुरोध कि अपनी यादों के झरोखों को देखें और जो भी याद हों, वे कविताएं मेरे फेसबुक मेसेज बॉक्स में या gonujha.jha@gmail.com पर भेजें। आपकी दी कविताएं आपके नाम के साथ पोस्ट की जाएंगी।
इस बार की सीरीज में प्रस्तुत की जा रही हैं- मृदुला प्रधान की कविताएं! मृदुला प्रधान हिन्दी की कवि हैं। उनकी कविताओं में आम जीवन बोलता है। ये कविताएं छोटी कक्षाओं के बच्चों से लेकर 10-12वी कक्षा के बच्चे भी पढ़ सकते हैं। आज की कविता, बड़ी क्लास के बच्चों के लिए-  सूर्योदय

सूर्योदय!

सात घोड़ों ने कसी जीनें
कि किरणें कसमसाईं
झील में जैसे किसी ने घोल दी
जी भर ललाई ।
पिघलती
सोने की नदियों
पर पड़ी आभा गुलाबी
फालसई चश्मे में ज्यों
केसर मिला दी।
इंद्रधनुषी रंग में
चमकी
चपल, चंचल किरण
एक छक्का लाल- सा
हौले से ऊपर को उठा
कहते हैं,

सूर्योदय हुआ। ###

मंगलवार, 24 जून 2014

महानगर की धूप

इस ब्लॉग का उद्देश्य बालोपयोगी कविताएं देना है, ताकि स्कूल जानेवाले हर उम्र के बच्चे अपनी ज़रूरत के मुताबिक इसमें से कविताएं ले सकें। लोगों की सहभागिता बढ़ाने के लिए हमने उनकी यादों से कविताएं मांगी। बच्चों से स्कूलों में पढ़ाई जानेवाली कविताएं। आपसे अनुरोध कि अपनी यादों के झरोखों को देखें और जो भी याद हों, वे कविताएं मेरे फेसबुक मेसेज बॉक्स में या gonujha.jha@gmail.com पर भेजें। आपकी दी कविताएं आपके नाम के साथ पोस्ट की जाएंगी।
इस बार की सीरीज में प्रस्तुत की जा रही हैं- मृदुला प्रधान की कविताएं! मृदुला प्रधान हिन्दी की कवि हैं। उनकी कविताओं में आम जीवन बोलता है। ये कविताएं छोटी कक्षाओं के बच्चों से लेकर 10-12वी कक्षा के बच्चे भी पढ़ सकते हैं। आज की कविता, बड़ी क्लास के बच्चों के लिए-  महानगर की धूप

यह महानगर की धूप है,
नपी, तुली, छनी हुई,
अट्टालिकाओं के पीछे से
कट-छंटकर
आती है,
आरी-तिरछी होती हुई
निकल जाती है,
गांवों-कस्बों की तरह
भर-भर आँगन
नहीं आती,
टार पर फैले
पचासों कपड़े नहीं सुखाती,
कभी मुँडेरों
तो कभी दीवारों पर ही
सिमट जाती है,
यह महानगर की धूप है
बिजली और पानी की तरह
कभी आती है
कभी नहीं आती है। ####

गुरुवार, 19 जून 2014

नीम का एक पेड़

इस ब्लॉग का उद्देश्य बालोपयोगी कविताएं देना है, ताकि स्कूल जानेवाले हर उम्र के बच्चे अपनी ज़रूरत के मुताबिक इसमें से कविताएं ले सकें। लोगों की सहभागिता बढ़ाने के लिए हमने उनकी यादों से कविताएं मांगी। बच्चों से स्कूलों में पढ़ाई जानेवाली कविताएं। आपसे अनुरोध कि अपनी यादों के झरोखों को देखें और जो भी याद हों, वे कविताएं मेरे फेसबुक मेसेज बॉक्स में या gonujha.jha@gmail.com पर भेजें। आपकी दी कविताएं आपके नाम के साथ पोस्ट की जाएंगी।
इस बार की सीरीज में प्रस्तुत की जा रही हैं- मृदुला प्रधान की कविताएं! मृदुला प्रधान हिन्दी की कवि हैं। उनकी कविताओं में आम जीवन बोलता है। ये कविताएं छोटी कक्षाओं के बच्चों से लेकर 10-12वी कक्षा के बच्चे भी पढ़ सकते हैं। आज पढ़िये इनकी कविता  "नीम का एक पेड़"

नीम का एक पेड़
बाहर के ओसारे से लगे तो
गर्मियों के दिन में,
उसकी छांव में
बैठा करेंगे
कड़ी होगी धूप
जाड़ों में तो सर पर,
नीम की डालों से हम
पर्दा करेंगे।
पतझड़ों में सूखकर
पीले हुए पत्ते
ओसारे-लॉन पर जब
आ बिछेंगे
सरसराहट-सी उठेगी
हवा सरकाएगी जब-तब
मर्मरी आवाज
आएगी, जो पत्तों पर चलेंगे,
हर वक़्त कलरव
कोटरों से पक्षियों का
किसलयों के रंग पर
कविता करेंगे
नीम का एक पेड़
बाहर के पसारे से लगे तो
हम सुबह से शाम तक
मौसम की रखवाली करेंगे। ###




सोमवार, 16 जून 2014

रिमझिम-रिमझिम....!

इस ब्लॉग का उद्देश्य बालोपयोगी कविताएं देना है, ताकि स्कूल जानेवाले हर उम्र के बच्चे अपनी ज़रूरत के मुताबिक इसमें से कविताएं ले सकें। लोगों की सहभागिता बढ़ाने के लिए हमने उनकी यादों से कविताएं मांगी। बच्चों से स्कूलों में पढ़ाई जानेवाली कविताएं। आपसे अनुरोध कि अपनी यादों के झरोखों को देखें और जो भी याद हों, वे कविताएं मेरे फेसबुक मेसेज बॉक्स में या gonujha.jha@gmail.com पर भेजें। आपकी दी कविताएं आपके नाम के साथ पोस्ट की जाएंगी।
इस बार की सीरीज में प्रस्तुत की जा रही हैं- मृदुला प्रधान की कविताएं! मृदुला प्रधान हिन्दी की कवि हैं। उनकी कविताओं में आम जीवन बोलता है। ये कविताएं छोटी कक्षाओं के बच्चों से लेकर 10-12वी कक्षा के बच्चे भी पढ़ सकते हैं। आज पढ़िये इनकी कविता  "रिमझिम-रिमझिम" 

रिमझिम-रिमझिम पड़ी सुनाई
देखो मम्मी, बारिश आई।
जूते लाओ, छाता लाओ,
आओ छत पर खेलें,
छप-छप पानी पर कूदें,
और खाएं आलू फ्राई।
रिमझिम-रिमझिम....
देखो बाबा आए हैं क्या?
गरम समोसा लाए हैं क्या?
चाय बना दो तुम जल्दी,
हमको पेप्सी देना भाई,
रिमझिम-रिमझिम....
चलो घूमने भुट्टा खाएं,
नाना-नानी से मिल आएँ,
नानी की अगड़म-बगड़म
नाना की गोदी चढ़ जाएँ।
टिप-टिप-टिप-टिप पड़ी सुनाई

मम्मी फिर से बारिश आई। ###

गुरुवार, 12 जून 2014

हमने खूब पढ़ाई की।

इस ब्लॉग का उद्देश्य बालोपयोगी कविताएं देना है, ताकि स्कूल जानेवाले हर उम्र के बच्चे अपनी ज़रूरत के मुताबिक इसमें से कविताएं ले सकें। लोगों की सहभागिता बढ़ाने के लिए हमने उनकी यादों से कविताएं मांगी। बच्चों से स्कूलों में पढ़ाई जानेवाली कविताएं। आपसे अनुरोध कि अपनी यादों के झरोखों को देखें और जो भी याद हों, वे कविताएं मेरे फेसबुक मेसेज बॉक्स में या gonujha.jha@gmail.com पर भेजें। आपकी दी कविताएं आपके नाम के साथ पोस्ट की जाएंगी।
इस बार की सीरीज में प्रस्तुत की जाएंगी, मृदुला प्रधान की कविताएं! पिछली पोस्ट में आपने पढ़ा था - "सूरज का ..."। मृदुला प्रधान हिन्दी की कवि हैं। उनकी कविताओं में आम जीवन बोलता है। ये कविताएं छोटी कक्षाओं के बच्चों से लेकर 10-12वी कक्षा के बच्चे भी पढ़ सकते हैं। आज पढ़िये इनकी कविता हमने खूब पढ़ाई की।

हमने खूब पढ़ाई की
तो नंबर अच्छे आए,
दादा-दादी पास बिठाकर
मुझे खूब दुलराए
दादा झट से बरफी लाए
दादी की चढ़ी कढ़ाई,
पूरी-हलवा की खुशबू
पूरे घर में आई।
दादी ने पकवानों की
खूब अंबार लगाई
मम्मी ने खाने की टेबल
खूब ही खूब सजाई।
पापा जब ऑफिस से आए
पूछा दरवाजे से
नीचे तक फैली है खुशबू
क्या अपने ही घर से?
बात हुई क्या, मुझे बताओ
तब मम्मी ने बतलाया
अच्छे-अच्छे नंबर
अपनी गुड़िया है लाई,
पापा ने फिर ठोकी पीठ
सीने से मुझे लगाया
गालों को चूमा मम्मी ने
क्या कहूँ, मजा जो आया! ###





सोमवार, 9 जून 2014

सूरज की....! -मृदुला प्रधान

इस ब्लॉग का उद्देश्य बालोपयोगी कविताएं देना है, ताकि स्कूल जानेवाले हर उम्र के बच्चे अपनी ज़रूरत के मुताबिक इसमें से कविताएं ले सकें। लोगों की सहभागिता बढ़ाने के लिए हमने उनकी यादों से कविताएं मांगी। बच्चों से स्कूलों में पढ़ाई जानेवाली कविताएं। आपसे अनुरोध कि अपनी यादों के झरोखों को देखें और जो भी याद हों, वे कविताएं मेरे फेसबुक मेसेज बॉक्स में या gonujha.jha@gmail.com पर भेजें। आपकी दी कविताएं आपके नाम के साथ पोस्ट की जाएंगी।
इस बार की सीरीज में प्रस्तुत की जाएंगी, मृदुला प्रधान की कविताएं! पिछली पोस्ट में आपने पढ़ा था - "सूरज का घर"। मृदुला प्रधान हिन्दी की कवि हैं। उनकी कविताओं में आम जीवन बोलता है। ये कविताएं छोटी कक्षाओं के बच्चों से लेकर 10-12वी कक्षा के बच्चे भी पढ़ सकते हैं। आज पढ़िये इनकी कविता नन्हें बच्चों के लिए।

सूरज की पहली किरणों पर
आज नया कोई गीत लिखें,
आज रश्मियों के कण-कण से
नया कोई संगीत लिखें।
चलो, वसंती किलकारी सुन
मन अपना अभिसिक्त करें,
खग, नभ की बातें कर के
मन अपना प्रदीप्त करें।
हर कोई अपने में है
हम भी अपने में खो जाएँ।
सुनो, रात होनेवाली है,

आओ, हम-तुम सो जाएँ। ###

गुरुवार, 5 जून 2014

सूरज का घर

इस ब्लॉग का उद्देश्य बालोपयोगी कविताओ को देना है, ताकि स्कूल जानेवाले हर उम्र के बच्चे अपनी ज़रूरत के मुताबिक इसमें से कविताएं ले सकें। लोगों की सहभागिता बढ़ाने के लिए हमने उनकी यादों से कविताएं मांगी। बच्चों से स्कूलों में पढ़ाई जानेवाली कविताएं। आपसे अनुरोध कि अपनी यादों के झरोखों को देखें और जो भी याद हों, वे कविताएं मेरे फेसबुक मेसेज बॉक्स में या gonujha.jha@gmail.com पर भेजें। आपकी दी कविताएं आपके नाम के साथ पोस्ट की जाएंगी।
आज प्रस्तुत है,  मृदुला प्रधान की कविता- "सूरज का घर"। मृदुला प्रधान हिन्दी की कवि हैं। उनकी कविताओं में आम जीवन बोलता है। बच्चों के लिए भी उन्होने कविताएं लिखी हैं। ये कविताएं छोटी कक्षाओं के बच्चों से लेकर 10-12वी कक्षा के बच्चे भी पढ़ सकते हैं। आज की कविता नन्हें बच्चों के लिए।  

सूरज का घर कहाँ
और माँ, चाँद कहाँ सोता है?
तारे क्यों छम-छम करते
बादल कैसे उड़ता है?
सुबह कहाँ से आती है
और रात कहाँ जाती है?
हवा कहाँ बैठी रहती
बारिश कैसे होती है?
कैसे खिलता फूल,
पेड़ कैसे लंबा होता है?
सूरज के गोले में कह दो
कौन धूप भरता है?
इंद्रधनुष कैसे बनता
और छाया कौन बनाता है?
माँ तुम्हीं कहो कि
मेरे उठने से पहले ही
चाँद कहाँ छुप जाता है? ###