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शनिवार, 10 मई 2008

अबकी ऎसी छुट्टी हो

छुट्टी कि अब बात चली

छुट्टी ही दिन रात चली

धरो किताबें, कलम, सवाल

सोने हो एक ही हाल

चादर कहीं और हम हों कहीं

पापा और तुम जाओ कहीं

पेट में चूहे दौदें जब

मम्मी देना कुछ भी टैब

लेकिन कुछ भी खाऊँ कैसे

स्वाद मेरे अक्षर के जैसे

खेल -खेल और खेल खेल

चाहे दुनिया गोलामगोल

मुझसे भारी कोई नहीं

मुझसे न्यारी कोई नहीं

घडी की अब ना बात करो

छुट्टी मे संग साथ रहो

तुम भी आओ, मेरे संग

खेलेंगे हम हर इक रंग

मम्मी के संग जाना बाज़ार

पापaa के संग गुडिया बीमार

bhaiya लाए चाट उधार

दीदी की चुन्नी चताखार

ऎसी छुट्टी होए अब

इसमें ही खोएं रहें सब।

2 टिप्‍पणियां:

राजीव रंजन प्रसाद ने कहा…

बहुत अच्छी रचना..


***राजीव रंजन प्रसाद

डॉ .अनुराग ने कहा…

khoobsurat si.....masoom kavita.