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बुधवार, 9 जुलाई 2008

एक और किसान गीत

बचपन में इस किसान गीत को हम सब नृत्य के साथ गाते थे। आज भी इसका माधुरी बरकरार है-
आम मजरायल, बूंट गजरायल
चहके ला सरसों के फूल हो, चहके ला सरसों के फूल हो,
हँसी हँसी बोले पिया हरबहवा
चल' धनी खेतवा के ओर हो,
चहके ला सरसों के फूल हो।
कनखी से देखे ला छोटका देबरवा
मारले कनवां पे फूल हो,
चहके ला सरसों के फूल हो।
रोही-रोही बोलेले गोदी बलकवा
दिन भर ना मिलेले दूध हो,
चहके ला सरसों के फूल हो,

2 टिप्‍पणियां:

Manish Kumar ने कहा…

achcha laga ise yahan padh kar

Mired Mirage ने कहा…

बहुत सुन्दर ! ऐसे गीतों को तो संजोकर रख लेना चाहिए, खो न जाएँ कहीं।
घुघूती बासूती