आज पढ़ते-पढ़ते अचानक गोपाल दास सक्सेना 'नीरज' की यह कविता हाथ लगी। नीरज जी बहुत अच्छे कवि व गीतकार हैं, जिनका सम्मान हिन्दी साहित्य ने अपनी गुटबंदी के कारण नहीं किया। मगर वे इसके मुन्हाताज़ न हो कर अपनी रचना प्रक्रिया में लीं रहते आए हैं। यह कविता उनके प्रति पूरे आदर व् सम्मान व्यक्त करते हुए ली जा रही है।
जाती-पाती से बड़ा धर्म है
धर्म-ध्यान से बड़ा कर्म है
कर्मकांड से बड़ा मर्म है
मगर सभी से बड़ा यहाँ यह छोटा सा इंसान है,
और अगर वह प्यार करे तो धरती स्वर्ग समान है।
जितनी देखी, दुनिया सबकी, देखी दुल्हन ताले में,
कोई क़ैद पडा मस्जिद में, कोई बंद शिवाले में
किसको अपना हाथ थमा दूँ, किसको अपना मन दे दूँ
कोई लुटे अंधियारे में, कोई ठगे उजाले में
सबका अलग-अलग थान - गन है
सबका अलग-अलग वंदन है
सबका अलग-अलग चंदन है
लेकिन सबके सर के ऊपर नीला एक वितान है
फ़िर क्यों जाने यह सारी धरती लहू-लुहान है?
हर खिड़की पर परदे घायल आँगन हर दीवारों से
किस दरवाजे करून वन्दना, किस देहरी मत्था टेकून
काशी में अंधियारा सोया, मथुरा पटी बाज़ारों से,
हर घुमाव पर छीन-झपट है
इधर प्रेम तो उधर कपट है
झूठ किए सच का घूंघट है
फ़िर भी मनुज अश्रु की गंगा, अबतक पावन प्राण है
और नहा ले उसमें तो फ़िर माना ही भगवान है।
- नीरज
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हर घुमाव पर छीन-झपट है
इधर प्रेम तो उधर कपट है
झूठ किए सच का घूंघट है
फ़िर भी मनुज अश्रु की गंगा, अबतक पावन प्राण है
और नहा ले उसमें तो फ़िर माना ही भगवान है।
" बहुत ही सुंदर अभिव्यक्ति ..."
Regards
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