इस कविता के लिए प्रतिमा कहती हैं- "इस कविता से मेरी नानी की यादें जुड़ी हैं . इस कविता को हमने कहीं पढ़ा नहीं बल्कि उन्हीं के मुँह से सुना था और आज भी याद है. एक से दस तक की गिनती किसी नन्हें बच्चे को सिखाने का कितना प्यारा और आसान तरीका .... है न !"
एक राजा की बेटी थी ,
दो दिन से बीमार पड़ी,
तीन डाक्टर सुन कर आए ,
चार दवा की पुड़िया लाए ,
पांच बार घिस गरम कराई ,
छः-छः घंटे बाद पिलाई ,
सात दिनों में आँखें खोलीं ,
आठ दिनों में हँस कर बोली ,
नौ दिनों में ताकत आई ,
दस वें दिन उठ दौड़ लगाई !








6 comments:
achchhi kavita
http://sanjaykuamr.blogspot.com/
दमदार कविता ...
आप बेशक छुटपन की कविता लेकिन ये तो मुझे भी अच्छी लगी - वाह
बढ़िया..गिनती भी सीख गये.
Ap sabka bahut bahut shukriya. aap sabkee yadon ke jharokhon se bhi kavitaon ka intazaar rahega.
अरे वाह! मैं भी टीचर हूँ और.....दाड़ी भी.मेरे तो घर और स्कूल दोनों जगह काम आएगी ये कविताएँ.मैं भी लिखती हूँ.बच्चों का सारा कोर्स ही मैंने गे रूप में ढाल दिया है.इसी तरह पढाती और सिखाती हूँ बच्चो को.अभी जरा........स्वस्थ हो जाऊं तब याद दिलाना खूब कविताये भेजूंगी इस ब्लॉग पर तुम सब बच्चों के लिए क्योंकि मैं बच्चो को बहुत प्यार करती हूँ.ना हाथ लगती हूँ ना लगाने देती हूँ.सच्ची.
ऐसिच हूँ मैं -सबको खूब प्यार करने वाली
प्यार
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