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बुधवार, 23 जुलाई 2008

मेरी मुर्गी खो गई है ना

यह गीत भी हम सब बच्चों के थिएटर वर्कशौप में गाते हैं। बच्चे बड़े मजे ले कर इसे गाते हैं और इस पर नाचते हैं। आपका मन करे तो रुकियेगा मत। लोक गीत का रस और रिश्ते की चुहल का मज़ा आप भी लें।

मेरी मुर्गी खो गई है ना
मेरा दिल ठिकाने nahi ना
ससुर आया बोला बहू क्या बनाया खाना
तुम चुपचाप अखबार पढो ना,
मेरा दिल ठिकाने है ना
सासू आई बोली बहू, क्या बनाया खाना,
तुम चुप चाप मन्दिर जाओ ना,
मेरा दिल ठिकाने है ना
ननद आई, बोली भाभी क्या बनाया खाना,
तुम अपनी ससुराल जाओ ना,
मेरा दिल ठिकाने है ना
देवर आया, बोला, भाभी, क्या बनाया खाना
तुम अपनी दुल्हन लाओ ना,
मेरा दिल ठिकाने है ना
पति आया बोला रानी क्या बनया खाना
श ..श..श..श॥
छींके पर मुर्गी है ना
तुम चुप चाप ले के खाओ ना
ससुर से कुछ कहियो ना
तुम चुप चाप मुर्गी खाओ ना
सासू से कुछ कहियो ना
मेरा दिल ठिकाने है ना
देवर से कुछ कहियो ना
मुर्गी तुम ले कर खाओ ना
ननदी से जा कहियो ना
तुम चुप चाप मुर्गी खाओ ना।

मेरी मुर्गी खो गई है ना

मेरा दिल ठिकाने हैना

4 टिप्‍पणियां:

कुश एक खूबसूरत ख्याल ने कहा…

हा हा बहुत बढ़िया गीत है

Rajesh Roshan ने कहा…

हा हा हा मजेदार है
मेरी मुर्गी खो गई है ना

राज भाटिय़ा ने कहा…

मुर्गी बेचारी...्ससुर बेचारा, सास बेचारी, ननद ओर देवर बेचारा... मुर्गी बेचारी गई काम से
बहुत सुन्दर , धन्यवाद

Udan Tashtari ने कहा…

हा हा मजेदार है