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मंगलवार, 11 मार्च 2008

ताड़ काटो..

बचपन में हम सब इस कविता को पढ़ते हुए बहुत खेलते थे। बाकायदा बच्चों की टोली होती। पूरे एक्शन के साथ हम इसे खेलते और गाते, गाते और खेलते। यह एक्शन टू यहाँ नहीं दिखाया जा सकता, पर, कविता ज़रूर पढी जा सकती है-
ताड़ काटो, तरकुन काटो, काटो रे बर्खाजा
हाथी पर के धिमुनी चमक उठे राजा
राजा की रजाई, भैया की दुलाई
ईंट मारू, झींट मारो, मुन्गरी झपट्टा ।

शुक्रवार, 9 नवंबर 2007

मज़ा आ गया खेल में


मज़ा आ गया खेल में
भालू बैठा रेल में
हँस कर बोला अच्छा टाटा
मैं कर आऊँ सैर सपाटा
- स्वप्निल

शुक्रवार, 2 नवंबर 2007

लाला जी और केला


लाला जी ने केला खाया
केला खा के मुँह बिचाकाया
मुँह बिचका कर छडी घुमाई
छडी घुमा कर कदम बढाया
कदम के नीचे छिलका आया
लाला जी गिरे धडाम!
मुँह से निकला -'हाय राम, हाय राम!'


सोमवार, 29 अक्टूबर 2007

हाथी की शान


हाथी आया झूम के
धरती माँ को चूम के
टाँगें उसकी मोटी मोटी
आंखें उसकी छोटी- छोटी
सूंड हिलाता आता है
गन्ने पत्ते खाता है
पंखे जैसे उसके कान
देखो बच्चों उसकी शान।