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बुधवार, 19 नवंबर 2008

गुडिया रोई मुन्नी रोई

यह कविता रेखा दी ने अपनी यादों की पिटारी से निकाल कर हमें दी है। आप भी अपनी पिटारी खोलें और कवितायें bhejen gonujha.jha@gmail.com पर


नन्हीं मुन्नी ओढे चुन्नी
गुडिया खूब सजाई है,
किस गुड्डे के साथ हुई
इसकी आज सगाई है.
रंग बिरंगी ओढे चुनरिया
माथे पर चमके है बिंदिया
खन-खन खनके हाथ के कंगना
अब छोड़ चली मुन्नी का अंगना .

गुडिया रोई मुन्नी रोई
संग संग सखी सहेली रोईं
कल ही चल देगी यह तो
सोच सोच कर अखियाँ धोईं ।

-साभार, रेखा श्रीवास्तव

सोमवार, 27 अक्टूबर 2008

देश के सच्चे सपूत कहाना

छुटपन की कवितायें के लिए मैंने रेखा दी से अनुरोध किया। वे मान गई और अपने बचपन की एक कविता लिख के भेजी है, जिसे आपको पेश कर रही हूँ। आप भी हमे अपने बचपन में सुनी कवितायें भेजें, ताकि हमारी नन्ही पीढी इन्हें दुहरा सकें। कवितायें gonujha.jha@gmail.com पर भेजें।

"यह कविता मैंने बचपन में जब १९६२ में चीन की लडाई चल रही थी तो अपने स्कूल में पढ़ी थी १५ अगस्त को।"

सीमा को जाता है भाई,

बहन बधाई देने आई,

आंसू अपने रोक न पाई,

फिर भी यह कहकर मुस्काई।

देखो भैया वचन निभाना,

पीठ दिखा कर भाग न आना,

देख रहा है तुम्हें जमाना,

मत माता का दूध लजाना।

दुश्मन को तुम जाके भागना,

भारत माँ की लाज बचाना,

सीना चौडा करके आना,

देश के सच्चे सपूत कहाना

- रेखा श्रीवास्तव