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रविवार, 13 दिसंबर 2009

छोटी चिडिया चक चक चूं

इस बार की कविता कोशी की याद से. आप भी अपनी याद को जरा टटोलिए और अपनी कविता हमें भेजें इस ब्लॉग के लिए- gonujha.jha@gmail.com पर

छोटी चिडिया चक चक चूं
तेरी चोंच ना ठहरे क्यूं

फुदक फुदक फुदक रही,
डाल डाल पर चहक रही
उडे फर फर फर फर फूं

छोटी चिडिया चक चक चूं
तेरी चोंच ना ठहरे क्यूं.

सोमवार, 9 नवंबर 2009

बी सैलानी क्या कहती हैं?


इस बार की कविता पाकिस्तान के एक अज़ीम शायर और अदीब अहफाज-उर-रहमान की. हिन्दुस्तान के जबलपुर में पैदा हुए रहमान साहब पाकिस्तान के मशहूर लेखक और शायर के साथ साथ वहां के तेज़ तर्रार पत्रकार भी हैं. उन्होंने एक साथ पाकिस्तान की तानाशाही सत्ता और प्रेस की आज़ादी और मीडिया कामगारों के लिए लडाइयां लडी हैं. अबतक उनकी 18 किताबें शाया हो चुकी हैं. फरवरी 2008 का दिन पाकिस्तानी अदब का एक ऐतिहासिक दिन था, जब रहमान साहब की एक साथ चार किताबें आईं. उनकी यह कविता खास तौर से इस ब्लॉग के लिए महनाज़ साहिबा ने मुहय्या कराई हैं. दोनों का आभार. आप भी अपनी यादों के झरोखे से बचपन की कुछ कविताएं हमें भेजें gonujha.jha@gmail.com पर.

बी सैलानी क्या कहती हैं?

बी सैलानी क्या करती हैं?

सुबह सवेरे उनका नारा

गूंज उठा है घर के अन्दर

जाऊंगी मैं घर के बाहर

म्याऊं म्याऊं से मैं खेलूंगी

दूध से उसको नहलाऊंगी

वो उछलेगी, गुर्राएगी

मैं नाचूंगी, इतराऊंगी

उसकी मोटी दुम खेंचूंगी

मैं झपटूंगी, वो भागेगी

सब कहते हैं दम तो ले लो

पहले अपना मुंह तो धो लो

मुंह धो कर कुछ खाना खा लो

वो कहती है नो नो नो

खाना वाना क्या खाना है

मुझको तो बाहर जाना है.

रविवार, 25 अक्टूबर 2009

आज पिया की सालगिरह है

इस बार एक कविता पाकिस्तान से। इसे महनाज़ रहमान ने भेजा है। महनाज़ एक पत्रकार हैं, लेखक हैं, बहुत ही संवेदनशील इनसान हैं। कई एन जी ओ के लिए काम करती हैं। २३ साल से हमारी उनकी दोस्ती है। हमारी गुजारिश पर उन्होंने ये कविता भेजी है। आप सबसे भी अनुरोध है की अपनी यादों के पिटारे से एकाध कविता हमें भेजें। gonujha.jha@gmail.com पर।

पिया ने मेकअप कर डाला है,
बन ठन कर बाहेर आये हैं
सारी महफिल पर छाई है
अब किस बात की देर है मामा
चलें, चलकर केक तो काटें,
उछलें, कूदें, नाचे, गाएं
आहा, आहा, आहा,
आज पिया की सालगिरह है
सालगिरह में बडा मज़ा है.

शुक्रवार, 25 सितंबर 2009

यह कदंब का पेड़- सुभद्रा कुमारी चौहान

मेरे अनुरोध पर संपादक (सृजनगाथा) जयप्रकाश मानस ने अपने बचपन के पिटारे से यह कविता भेजी हैं। उनके ही शब्दों में - "भूला नहीं अब तक । शायद तीसरी या चौंथी में पढ़ा था । कदंब का पेड़ तो था नहीं हमारे घर के आसपास । पर गीत का प्रभाव इतना था कि जब भी दोस्तों के साथ खेलते-फांदते नजदीक के जंगल में चले जाते और किसी फलदार पेड़ पर चढ़कर दहीकादो जैसे खेल खेलते तो मन के भीतर सुभद्रा कुमारी चौहान द्वारा लिखा यही गीत गूँजने लगता । शायद इसी गीत के ताल, छंद, लय और भाव का इतना प्रभाव मन पर पड़ा कि मेरे लेखन की शुरुआत भी बाल गीतों से हुई । खैर... आप भी गुनगुनाइये यह गीत. " आप भी अपनी कवितायें भेजें - gonujha.jha@gmail.com पर।

यह कदंब का पेड़ अगर माँ होता यमुना तीरे।मैं भी उस पर बैठ कन्हैया बनता धीरे-धीरे।।
ले देतीं यदि मुझे बांसुरी तुम दो पैसे वाली।किसी तरह नीची हो जाती यह कदंब की डाली।।
तुम्हें नहीं कुछ कहता पर मैं चुपके-चुपके आता।उस नीची डाली से अम्मा ऊँचे पर चढ़ जाता।।
वहीं बैठ फिर बड़े मजे से मैं बांसुरी बजाता।अम्मा-अम्मा कह वंशी के स्वर में तुम्हे बुलाता।।
बहुत बुलाने पर भी माँ जब नहीं उतर कर आता।माँ, तब माँ का हृदय तुम्हारा बहुत विकल हो जाता।।
तुम आँचल फैला कर अम्मां वहीं पेड़ के नीचे।ईश्वर से कुछ विनती करतीं बैठी आँखें मीचे।।
तुम्हें ध्यान में लगी देख मैं धीरे-धीरे आता।और तुम्हारे फैले आँचल के नीचे छिप जाता।।
तुम घबरा कर आँख खोलतीं, पर माँ खुश हो जाती।जब अपने मुन्ना राजा को गोदी में ही पातीं।।
इसी तरह कुछ खेला करते हम-तुम धीरे-धीरे।यह कदंब का पेड़ अगर माँ होता यमुना तीरे।।
- जयप्रकाश मानस

सोमवार, 17 अगस्त 2009

अंगूर का अनार

कुछ बच्चियों ने मिलकर बनाया एक ब्लाग- http://paripoems।blogspot.com/ यह कविता वहीं से ली गई है। आप भी अपनी पिटारी खोलें और कवितायें भेजें gonujha.jha@gmail.com पर ।

बात है यह बहुत पुरानी

खा रही थी अंगूर एक रानी

बीज उसके गले में फंसता

यह देख कर भाई उसका बहुत हंसता

जितने भी अंगूर वह पाती

बीज निकाल कर ही खाती

बीज वह बगीचे में बोती

अंगूर होंगे खूब, वह सोचती

बीते कई महीने-साल

अंगूर ना उगा

पर उग गया अनार

रविवार, 16 अगस्त 2009

क्योंकि पेड़ है जीवन डोर

कुछ बच्चियों ने मिल कर एक ब्लॉग बनाया उन्हीं में से एक कविता यहाँ है। आप भी पढें और अपनी यादों के पिटारे से कवितायें भेजे इस ब्लॉग पर देने के लिए- पर

पेड़ों के कट जाने के बाद

बचेगी नहीं ये zindagii

पूछते हो क्यों

क्योंकि पेड़ है जीवन डोर

पेड़ कट जाने के बाद

हो जाएंगे हम बर्बाद

पूछते हो क्यों?

क्योंकि बचेगा ना कोई आहार

पेड़ कट जाने के बाद

जल जाएगी ये ज़मीन

पूछते हो क्यों?

क्योंकि छाया न होगी फिर कभी

पेड़ कट जाने के बाद

सूखा पड़ जाएगा हर कहीं

पूछते हो क्यों?

क्योंकि बारिश को बुलानेवाला न

होगा कोई ।

शुक्रवार, 14 अगस्त 2009

रिम-झिम बरसा पानी

कुछ बच्चियों ने मिल कर एक ब्लॉग -उन्हीं में से एक कविता यहाँ है। बारिश पर। आप भी पढें और अपनी यादों के पिटारे से कवितायें भेजे इस ब्लॉग पर देने के लिए
रिम-झिम बरसा पानी
लो भर जाते हैं सागर नाली
नाचते है भालू मोर
बच्चे खूब मचते शोर
आते हैं जब बदल काले काले
होती है बरसात हौले हौले
कड़की बिजली
लो बारिश गिरी
आती है जब बरसात
लाती है हर्याली साथ
जब बारिश को ग़ुस्सा आये
घर पर्वत भी उड़ ले जाये
पर बारिश न होगी जब
जीवन भी न बचेगा तब