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शुक्रवार, 6 मई 2011

गिन गिनती

यह कविता स्वर्णकांता की ओर से. स्वर्णकांता युवा पत्रकार हैं. दिल्ली में रहती हैं. गिनती पर कविताएं बहुत सृजनातमक है,. कविताई भी और गिनती की याद भी. आप भी अपनी यादों और अपने आसपास पर नज़र डालें और बच्चों के उपयोग की कविताएं हमें भेज डालें gonujha.jha@gmail.com पर.

एक दो- कभी ना रो


तीन-चार- रखना प्यार

पांच-छह- मिलकर रह

सात-आठ- पढ लो पाठ

नौ-दस- जोर से हंस
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शुक्रवार, 21 मई 2010

गिनती गिन लो प्यारे भाई!

यह कविता भी प्रतिमा की यादों से. आप भी अपनी यादों के झरोखे से एकाध कवितायें लाइये, ताकि आज के बच्चे उनका स्वाद ले सकें. भेजें- gonujha.jha@gmail.com पर

इस कविता के लिए प्रतिमा कहती हैं- "इस कविता से मेरी नानी की यादें जुड़ी हैं . इस कविता को हमने कहीं पढ़ा नहीं बल्कि उन्हीं के मुँह से सुना था और आज भी याद है. एक से दस तक की गिनती किसी नन्हें बच्चे को सिखाने का कितना प्यारा और आसान तरीका .... है न !"

एक राजा की बेटी थी ,
दो दिन से बीमार पड़ी,
तीन डाक्टर सुन कर आए ,
चार दवा की पुड़िया लाए ,
पांच बार घिस गरम कराई ,
छः-छः घंटे बाद पिलाई ,
सात दिनों में आँखें खोलीं ,
आठ दिनों में हँस कर बोली ,
नौ दिनों में ताकत आई ,
दस वें दिन उठ दौड़ लगाई !