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रविवार, 1 जून 2008

१,२,१०

स्वप्निल कि भेजी एक और कविता-

"१,२,१०
ऊपर से आई बस
बस ने मारी सीती
ऊपर से आया टीटी
टीटी ने काटी पर्ची
ऊपर से आया दर्जी
दर्जी ने सिली पैंट
ऊपर से आया टैंक
टंक ने मारा गोला
मेरा रंग दे बसंती चोला
- स्वप्निल