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सोमवार, 17 नवंबर 2008

एक अजूबा हमने देखा

svapnil ne bahut din baad ek kavitaa bhejii hai-


एक अजूबा हमने देखा

कुएं में लग गई आग

पानी पानी जर गओ,

मछरी खेलें फाग

नाव में नदिया डूबी जाए
एक अजूबा हमने देखा

कुँए में लग गई आग
पानी पानी जर गओ,

मछरी खेलें फाग

नांव में नदिया डूबी जाये

-स्वप्निल

गुरुवार, 3 जुलाई 2008

और एक प्रार्थना

स्वप्निल यह कविता स्कूलजाने से पहले जोर-जोर से बोलता था। उसकी नानी कहती हैं कि वह यह कविता वह अपनी डेढ़ साल की उम्र में ही बोलने लगा था। यह एक प्रार्थना है। स्वप्निल की शादी ११ जुलाई को हो रही है। उसे बधाई देते हुए उसी की बोली यह प्रार्थना-

हे भगवान, हे भगवान

हम सब बालक हैं नादाँ

बुरी बात से हमें बचाना

खूब पढाना, खूब लिखाना

हमें सहारा देते रहना

ख़बर हमारी लेते रहना

चरणों में हम पड़े हुए हैं

हाथ जोरकर खड़े हुए हैं

विद्या बुद्धि कुछ नहीं पास

हमें बना लो अपना दास।

लो हम शीश झुकाते हैं

विद्या पढ़ने जाते हैं।

गुरुवार, 5 जून 2008

कुछ कवितायें- खेल-खेल की

स्वप्निल ने एक कविता दी तो दो -तीन मुझे भी यद् आई। आपके सामने हैं ये। बस ज़रा खेल के मूड में आइये और मेज़ लीजिए-

जिप-ज़िप जू
कभी ऊपर, कभी नीचे
कभी दायें, कभी बाएँ
कभी आगे, कभी पीछे
कभी थप्पड़, कभी घूंसे
(अन्तिम लाइन बोलते हुए दो बच्चे एक दूसरे को प्यार से थापदियाते हैं।)
-स्वप्निल
( इन दोनों ही खेलों में सभी बच्चे एक लाइन में अपने दोनों पैर सामने की और फैलाकर बैठ जाते है। एक बच्चा इन पंक्तियों को बोलते हुए सभी के पैरों पर अपने हाथ फिराता है। बारी बारी से वह सभी बच्चों के नाम लेता है। अन्तिम पंक्ति पर सभी ताली बजाते हैं।)
ओल कटारा-बोल कटारा
एगो दिम्भा (पका कोई भी फल) पाया
हमने- स्वप्निल ने खाया
स्वप्निल की माँ से झगडा हुआ
धर दैन्या, धर दियां,
बीडी- सुपारी- बीडी- सुपारी।"

अतारो-पत्रो
सीमा गेल सीम तोड
नीमा गेल नीम तोड
कुछ दो तो रे भाई
(अन्तिम पंक्ति पर हाथ फेरानेवाला बच्चा जिस बच्चे के सामने हाथ पसारता है। वह बच्चा उसे कुछ देने का अभिनय करता है और इस तरह से खेल चलता रहता है।)

सोमवार, 2 जून 2008

डॉक्टर से २ कवितायेँ

डॉक्टर पर २ कवितायेँ। १ स्वप्निल ने भेजी तो एक मुझे भी याद आ गई। यह मेरी बेटी कोशी अपने छुटपन में गा-गा कर मुझे सुनाती थी। आप सब भी देखें-

"नीम्बू की प्लेट में
आम का अचार है
बुड्ढा नाराज़ है
बुढ़िया बीमार है
आ जा मेरे डॉक्टर, तेरा इंतज़ार है।"
- स्वप्निल

"आज सोमवार है
गुडिया को बुखार है
गुडिया गई डॉक्टर के पास
डॉक्टर ने मारी सुई
गुडिया रोई- उई, उई, उई।"

गुरुवार, 29 मई 2008

सैनिक

स्वप्निल ने अपने बचपन में सुनी कविताओं में से कुछ भेजी हैं। यह एक कविता उसने भेजी तो, लेकिन इसकी एक लाइन वह भूल गया है। हम उस लाइन के बिना ही इस कविता को दे रहे हैं, इस विश्वास के साथ कि आप में से कोई इस लाइन को पूरी कर दे।

हम सैनिक हैं, हम सैनिक हैं
लाराने को रण में जायेंगे
कुछ अपने हाथ दिखाएँगे
हम शूरवीर कहलायेंगे

घमासान हम समर करेंगे
नम जगत में अमर करेंगे
हम -सा ना बहादुर कोई है
जो कहते कर दिखालायेंगे
-------------------------- (अपूर्ण pankti)
रिपुओं के छक्के छुडायेंगे
- स्वप्निल