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रविवार, 1 मई 2011

मन के भोले भाले बादल

यह कविता शिवम की ज़बान से. अब शिवम 4थी कक्षा का छात्र है, बेहद शरारती, बेहद चंचल और बेहद बातूनी. आप उससे बात करते रह जायें, आप शायद थक जाएं, वह नही हार माननेवाला. सुनिए उसकी ज़बान से यह कविता. आप पढें मगर समझें कि सुन रहे हैं. अब आप भी अपनी याद को जरा टटोलिए और अपनी कविता हमें भेजें इस ब्लॉग के लिए- gonujha.jha@gmail.com पर. 


झब्बर झब्बर बालोंवाले, 
गुब्बारे से गालोंवाले
लगे दौडने आसमान में
झूम झूम कर काले बादल


कुछ जोकर से तोन्द फुलाए
कुछ हाथी से सूंड उठाए
कुछ ऊंटों से कूबडवाले
कुछ परियों से पंख लगाए


आपस में टकराते रह- रहे 
शेरों से मतवाले बादल,


कुछ तो लगते हैं तूफानी 
कुछ रह रह करते शैतानी
कुछ अपने थैलों से चुपके
झर झर झर बरसाते पानी 


कभी कभी छत पर आ जाते,
फिर चुपके ऊपर उड जाते 
बाढ नदी नालों में लाते 
फिर भी लगते बहुत भले हैं  
मन के भोले भाले बादल 
(कल्पनाथ सिंह) 





रविवार, 23 जनवरी 2011

जल्‍दी आओ मेरी लल्‍ली

तोषी आजकल दिल्ली में है. दिल्ली की चर्चा उसने फेसबुक पर की-
"दिल्ली- इस मंगल शुरु, उस मंगल खत्म
दिल्ली- तेरी ठंढ में ठिठुरेंगे नाक, कान और हम."
कमेंट्स मिलने लगे. उन्हीं में एक है, ऋषिकेश सुलभ जी का.

ऋषिकेश सुलभ हिंदी साहित्य और रंगमंच का एक अकेला ऐसा नाम है, जिनके साथ बैठकर आप घंटो बतिया सकते हैं, एकदम सहज और सरल भाव से. नाम के अनुसार ही  ऋषिकेश और सबके लिए सुलभ . पलक झपकते अपनी बात कविता में गढ दी. उसे यहां प्रस्तुत कर रही हूं. आप भी अपनी कवितायें यादों के झरोखे से निकाल कर लाएं और यहां बांटें. मेल करें ,gonujha.jha@gmail.com> पर . 

दि‍ल्‍ली-दि‍ल्‍ली बेहि‍स दि‍ल्‍ली....  
दि‍ल्‍ली हो गई बर्फ़ की सि‍ल्‍ली...
कैसे खेलें डंडा-गि‍ल्‍ली.....
मुम्‍बई है नज़र की झि‍ल्‍ली.....
पलक झपकते नोचे बि‍ल्‍ली.......
द्वार-द्वार पर लगी है कि‍ल्‍ली
पटना आओ मेरी लल्‍ली
हिंया उड़ी न तुम्‍हरी खि‍ल्‍ली
देखे तुमको बरस हुए
जल्‍दी आओ मेरी लल्‍ली
राज़ की बात बताएं तुमको
ठंडी हो रही चि‍कन-चि‍ल्‍ली
आओ-आओ मेरी लल्‍ली

सोमवार, 1 नवंबर 2010

सारी दुनिया गोल गोल

ये कविताएं हमें प्रशांत प्रियदर्शी ने हमें भेजी है. प्रशांत चेन्नै में रहते हैं, आईटी क्षेत्र में कार्यरत हैं, चेहरे की किताब (FB) पर बहुत सक्रिय हैं. उनकी भांजी ने ये कविताएं उन्हें सुनाई थी, जिसे मेरे आग्रह पर उन्होंने हमें भेजा है. आप भी अपनी यादों और अपने आसपास पर नज़र डालें और बच्चों की कविताएं हमें भेज डालें gonujha.jha@gmail.com पर.

नीचे की धरती गोल गोल


ऊपर का चंदा गोल गोल

मम्मी की रोटी गोल गोल

पापा का पैसा गोल गोल

हम भी गोल, तुम भी गोल

सारी दुनिया गोल गोल

- दीदी की बिटिया अप्पू के मुंह से



एक दो,

कभी ना रो.

तीन चार,

रखना प्यार.

पांच छः,

मिलकर रह.

सात आठ,

पढ़ लो पाठ.

नौ दस,

जोर से हँस.

- दीदी की बिटिया अदिति के मुंह से


.

बुधवार, 30 जून 2010

जिह्वा नृत्य (tongue twisters)

कुछ जिह्वा नृत्य (tongue twisters) आपके और आपके बच्चों के लिए. खुद भी अभ्यास करें और बच्चों को भी कराएं. बच्चे अपनी क्लास या अन्य कहीं इसकी प्रतियोगिता आदि भी कर सकते हैं. खेल का खेल, मनोरंजन का मनोरंजन और अभ्यास का अभ्यास. आप भी ऐसी अनोखी कविताएं, बातें इस ब्लॉग के लिए भेजें gonujha.jha@gmail.com पर. आपके नाम व संदर्भ के साथ इसे प्रकाशित किया जाएगा. अपनी अगली नस्ल की समृद्धि में अपना योगदान दें.


1 पीठ ऊंची ऊंट की ऊंचाई से नहीं होती, होती ही है, होती ही है, पीठ ऊंची ऊंट की.

2 चंदा चमके चम चम, चीखे चौकन्ना चोर, चीनी चाटे चींटी, चटोरी चीनी चोर.

3 खडग सिंह के खडकने से खडकती हैं खिडकियां, खिडकियों के खडकने से खडकता है खडग सिंह.

4 पके पेड पर पका पपीता, पका पेड या पका पपीता, पके पेड को पिंकू पकडे, पिंकू पकडे पका पपीता

5 चंदू के चाचा ने चंदू की चाची को चांदी के चमचे से चौदहवीं की चांदनी रात में चौथी बार चार चम्मच चटनी चटाई.

6 सुनिए श्रीमती सुषमा शर्मा, इस परिस्थिति में मस्तिष्क के समस्त स्नायु शिथिल व सुप्त हो चले हैं.

7 आप प्रथमत: अपने प्रिय पुत्र को प्रेम की पप्पी प्रेषित कर प्यार से पुचकारिये.

8 कलाम कलम ले कमल को कमाल कराने गया.

9 लडकी लकडी, ककडी कडाह में काट कराहने लगी.

10 राधा की नीबू में बूनी की धारा, धारा में राधा की बूनी बनी धारा

गुरुवार, 3 जून 2010

माँग-माँग कर पैसे लाती !

यह कविता भी प्रतिमा की यादों से. आप भी अपनी यादों के झरोखे से एकाध कवितायें लाइये, ताकि आज के बच्चे उनका स्वाद ले सकें. भेजें- gonujha.jha@gmail.com पर

इस कविता के लिए प्रतिमा कहती हैं- "याद है मुझे , छुटपन में डुगडुगी बजाता , बच्चों को बुलाता वो मदारी जिसके पास हीरो-हीरोइन जैसे दो बन्दर होते थे, मतलब वो ऐसा कहता था. चश्मा लगाये बन्दर और घाघरा पहने बन्दरिया .. आहा कित्ती प्यारी... मदारी की डुगडुगी पर हम बच्चों का घर से निकलना वैसे ही तय होता था , जैसे पैड्पाइपर के पाइप बजाने पर चूहों का निकलना, फिर चाहे सर्दी हो, बारिश हो , या हो चिलचिलाती धूप का मौसम....! ऐसे में इस कविता का हमें झटपट याद हो जाना कतई आश्चर्य का विषय नही कहा जा सकता..., बचपन बीत गया, मदारी भी कहीं गुम गये, मगर यादों में ये कविता रह गयी....

डम-डम,डम-डम करता आया,
बन्दर वाला , बन्दर लाया,
बन्दर के संग एक बन्दरिया,
पहने थी वो लाल घघरिया,
ठुमुक-ठुमुक कर नाच दिखाती,
माँग-माँग कर पैसे लाती !

शुक्रवार, 21 मई 2010

गिनती गिन लो प्यारे भाई!

यह कविता भी प्रतिमा की यादों से. आप भी अपनी यादों के झरोखे से एकाध कवितायें लाइये, ताकि आज के बच्चे उनका स्वाद ले सकें. भेजें- gonujha.jha@gmail.com पर

इस कविता के लिए प्रतिमा कहती हैं- "इस कविता से मेरी नानी की यादें जुड़ी हैं . इस कविता को हमने कहीं पढ़ा नहीं बल्कि उन्हीं के मुँह से सुना था और आज भी याद है. एक से दस तक की गिनती किसी नन्हें बच्चे को सिखाने का कितना प्यारा और आसान तरीका .... है न !"

एक राजा की बेटी थी ,
दो दिन से बीमार पड़ी,
तीन डाक्टर सुन कर आए ,
चार दवा की पुड़िया लाए ,
पांच बार घिस गरम कराई ,
छः-छः घंटे बाद पिलाई ,
सात दिनों में आँखें खोलीं ,
आठ दिनों में हँस कर बोली ,
नौ दिनों में ताकत आई ,
दस वें दिन उठ दौड़ लगाई !


बुधवार, 19 मई 2010

अटकन - बटकन, दहिया चटकन

यह कविता भी प्रतिमा की यादों से. आप भी अपनी यादों के झरोखे से एकाध कवितायें लाइये, ताकि आज के बच्चे उनका स्वाद ले सकें. भेजें- gonujha.jha@gmail.com पर
इस कविता के लिए प्रतिमा कहती हैं-  "केवल तुक मिलाती इस कविता का अर्थ आज भी नहीं पता, लेकिन इसे बोलकर पढने में बचपन में भी मज़ा आता था, अब भी आता है."  पढिये कविता और आप भी जरा तुकबंदे का स्वाद लीजिए:

अटकन - बटकन,


दहिया चटकन,

नानी लाई ,

खीर - मलाई ,

मुसवा मोटा ,

रुपिया खोटा,

माला टूटी ,

किस्मत फूटी ,

गोल बताशे ,

खेल -तमाशे,

खा लो चमचम ,

हरहर बमबम .  .