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गुरुवार, 29 मई 2014

माँ का जन्मदिन!

इस ब्लॉग का उद्देश्य बालोपयोगी कविताओ को देना है, ताकि स्कूल जानेवाले हर उम्र के बच्चे अपनी ज़रूरत के मुताबिक इसमें से कविताएं ले सकें। लोगोंकी सहभागिता बढ़ाने के लिए हमने उनकी यादों से कविताएं मांगी। बच्चों से स्कूलों में पढ़ाई जानेवाली कविताएं। आपसे अनुरोध कि अपनी यादों के झरोखों को देखें और जो भी याद हों, वे कविताएं हमें भेजें- मेरे फेसबुक मेसेज बॉक्स में या gonujha.jha@gmail.com पर मेल करें। आपकी दी कविताएं आपके नाम के साथ पोस्ट की जाएंगी।
आज प्रस्तुत है,  प्रेम रंजन अनिमेष की कविता- माँ का जन्मदिन। अपनी रचना प्रक्रिया के बारे मे प्रेम जी कहते हैं,  
भारतीय ज्ञानपीठ से वर्ष 2004 में प्रकाशित कविता संग्रह 'कोई नया समाचार'को विशेष रूप से चर्चा एवं सराहना प्राप्त हुई और कुछ सुधी साहित्य मर्मज्ञों ने इसे सूर के बाद बचपन को कविता का वैभव बनाने वाला अपनी तरह का अनूठा प्रयास माना  उस संग्रह की सारी कवितायें दरअसल बच्चों के माध्यम से इस जीवन जगत के व्यापक फलक को स्पर्श करती कवितायें हैं फिर खयाल आया कि बच्चों के बहाने तो इतनी कवितायें रचीं, कुछ ऐसी कवितायें लिखी जायें जो बच्चों के लिए  हों यों भी, बच्चों के लिए अच्छे साहित्य के निर्माण का पुण्यकर्म हर प्रतिबद्ध और गंभीर साहित्यकार का महत् कर्तव्य एवं उत्तरदायित्व होता है उसी प्रयास का फल हैं ये कवितायें -  'माँ का जन्मदिन'  इन कविताओं के लिए खासतौर पर आठ पंक्तियों के एकविशिष्ट शिल्प के संधान के साथ साथ यह भी कोशिश की है कि ये उतनी ही जीवंत और इन्दधनुषी हों जितना और जैसा स्वयं बचपन...। और अब इंतजार है कि ये शीघ्र ही एक यादगार बाल कविता संग्रह के रूप में सामने  आयें !

 माँ का जन्मदिन

 माँ  तेरा क्या  जन्म दिवस है
अभी  तुम्हारा  कौन बरस है

याद तुम्हें  तो है इतना कुछ
याद नहीं है क्यों अपना कुछ

मैं तो  पहले थी इक चिड़िया
साथ तुम्हारे  जन्मी  यह माँ

याद  मुझे  इतना ही  बस है
                       एक  हमारा   जन्मदिवस  है। ###

मंगलवार, 20 मई 2014

वह चिड़िया जो....!

इस ब्लॉग का उद्देश्य बालोपयोगी कविताओ को देना है, ताकि स्कूल जानेवाले हर उम्र के बच्चे अपनी ज़रूरत के मुताबिक इसमें से कविताएं ले सकें। लोगोंकी सहभागिता बढ़ाने के लिए हमने उनकी यादों से कविताएं मांगी। बच्चों से स्कूलों में पढ़ाई जानेवाली कविताएं। आपसे अनुरोध कि अपनी यादों के झरोखों को देखें और जो भी याद हों, वे कविताएं हमें भेजें- मेरे फेसबुक मेसेज बॉक्स में या gonujha.jha@gmail.com पर मेल करें। आपकी दी कविताएं आपके नाम के साथ पोस्ट की जाएंगी।
आज प्रस्तुत है  7वीं कक्षा के छात्र शिवम नारायण की याद से ली गई सुप्रसिद्ध कवि श्री केदारनाथ अग्रवाल की यह कविता।

वह चिड़िया जो....!

वह चिड़िया जो 
चोच मारकर, 
दूध भरे जुण्डी के दाने 
रुचि से, रस से खा लेती है
वह छोटी संतोषी चिड़िया, 
नीले पंखोंवाली मैं हूँ, 
मुझे अन्न से बहुत प्यार है, 

वह चिड़िया जो 
कंठ खोल कर 
बूढ़े वन बाबा की खातिर, 
रस उड़ेल कर गा लेती है 
वह छोटी, मुंहबोली चिड़िया 
नीले पंखोंवाली मैं हूँ, 
मुझे बिजन से बहुत प्यार है,  

वह चिड़िया जो
चोच मारकर 
चढ़ी नदी का दिल टटोलकर 
जल का मोती ले जाती है
वह छोटी, गर्वीली चिड़िया 
नीले पंखोंवाली मैं हूँ, 
मुझे नदी से बहुत प्यार है! ###

मंगलवार, 13 मई 2014

दिविक रमेश की दो कविताएं

 बहुत दिन बाद मुखातिब हूँ। इस ब्लॉग को आरंभ करने का उद्देश्य बालोपयोगी कविताओ को देना है, ताकि स्कूल जानेवाले हर उम्र के बच्चे अपनी ज़रूरत के मुताबिक इसमें से कविताएं ले सकें। लोगोंकी सहभागिता बढ़ाने के लिए हमने उनकी यादों से कविताएं मांगी। बच्चों ने स्कूलों में पढ़ाई जानेवाली कविताएं सुनाईं। फिर यह क्रम थम सा गया, क्योंकि कविताएं मिलनी बंद हो गईं। नेट का जमाना है, इसलिए कहीं से भी कविताएं ली जा सकती हैं। लेकिन, मैं लोगों की परस्पर सहभागिता चाहती रही। ज़रूरी नहीं कि आप लिखें ही। आपने बचपन में कविताएं सुन रखी होंगी। आप उन्हें अपनी यादों के झरोखे से हम तक पहुंचाएँ।
मुझे खुशी है कि इस बार बाल-साहित्य के चितेरे श्री रमेश दिविक जी ने अपनी दो कविताएं यहाँ शेयर करने की इजाजत दी है।  यह ब्लॉग और मैं उनके बहुत बहुत आभारी हैं। इन पर आपकी राय अपेक्षित हैं। आपसे यह भी अनुरोध कि अपनी यादों के झरोखों को देखें और जो भी याद हों, वे कविताएं हमें भेजें- मेरे फेसबुक मेसेज बॉक्स में या gonujha.jha@gmail.com पर मेल करें। आपकी दी कविताएं आपके नाम के साथ पोस्ट की जाएंगी।
यहा प्रस्तुत हैं-  रमेश दिविक की कविताएं।

आओ बूंदों, 

आकर मेरी क्यारी मे हल चलाओ, 

बहुत मज़ा आएगा ।

बहुत मज़ा आएगा, 

जब छूते हुए फसलों को 

निकाल जाएगी हवा 
इधर से उधर।

और फसलें, 

बिलकुल हम बच्चों सी 

खिलखिलाकर 

लोटपोट हो जाएंगी
#####
छाता

सड़क !

हो जाओ न थोड़ी ऊंची, 

बस मेरे नन्हें कद से थोड़ी ऊंची।

मैं आराम से निकाल जाऊंगा 

तुम्हारे नीचे-नीचे 

घर से स्कूल तक।

न मुझे धूप लगेगी, न बारिश।

हमारे घर में 

नहीं हॆ न छाता, सड़क!

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शुक्रवार, 6 मई 2011

गिन गिनती

यह कविता स्वर्णकांता की ओर से. स्वर्णकांता युवा पत्रकार हैं. दिल्ली में रहती हैं. गिनती पर कविताएं बहुत सृजनातमक है,. कविताई भी और गिनती की याद भी. आप भी अपनी यादों और अपने आसपास पर नज़र डालें और बच्चों के उपयोग की कविताएं हमें भेज डालें gonujha.jha@gmail.com पर.

एक दो- कभी ना रो


तीन-चार- रखना प्यार

पांच-छह- मिलकर रह

सात-आठ- पढ लो पाठ

नौ-दस- जोर से हंस
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रविवार, 1 मई 2011

मन के भोले भाले बादल

यह कविता शिवम की ज़बान से. अब शिवम 4थी कक्षा का छात्र है, बेहद शरारती, बेहद चंचल और बेहद बातूनी. आप उससे बात करते रह जायें, आप शायद थक जाएं, वह नही हार माननेवाला. सुनिए उसकी ज़बान से यह कविता. आप पढें मगर समझें कि सुन रहे हैं. अब आप भी अपनी याद को जरा टटोलिए और अपनी कविता हमें भेजें इस ब्लॉग के लिए- gonujha.jha@gmail.com पर. 


झब्बर झब्बर बालोंवाले, 
गुब्बारे से गालोंवाले
लगे दौडने आसमान में
झूम झूम कर काले बादल


कुछ जोकर से तोन्द फुलाए
कुछ हाथी से सूंड उठाए
कुछ ऊंटों से कूबडवाले
कुछ परियों से पंख लगाए


आपस में टकराते रह- रहे 
शेरों से मतवाले बादल,


कुछ तो लगते हैं तूफानी 
कुछ रह रह करते शैतानी
कुछ अपने थैलों से चुपके
झर झर झर बरसाते पानी 


कभी कभी छत पर आ जाते,
फिर चुपके ऊपर उड जाते 
बाढ नदी नालों में लाते 
फिर भी लगते बहुत भले हैं  
मन के भोले भाले बादल 
(कल्पनाथ सिंह) 





रविवार, 23 जनवरी 2011

जल्‍दी आओ मेरी लल्‍ली

तोषी आजकल दिल्ली में है. दिल्ली की चर्चा उसने फेसबुक पर की-
"दिल्ली- इस मंगल शुरु, उस मंगल खत्म
दिल्ली- तेरी ठंढ में ठिठुरेंगे नाक, कान और हम."
कमेंट्स मिलने लगे. उन्हीं में एक है, ऋषिकेश सुलभ जी का.

ऋषिकेश सुलभ हिंदी साहित्य और रंगमंच का एक अकेला ऐसा नाम है, जिनके साथ बैठकर आप घंटो बतिया सकते हैं, एकदम सहज और सरल भाव से. नाम के अनुसार ही  ऋषिकेश और सबके लिए सुलभ . पलक झपकते अपनी बात कविता में गढ दी. उसे यहां प्रस्तुत कर रही हूं. आप भी अपनी कवितायें यादों के झरोखे से निकाल कर लाएं और यहां बांटें. मेल करें ,gonujha.jha@gmail.com> पर . 

दि‍ल्‍ली-दि‍ल्‍ली बेहि‍स दि‍ल्‍ली....  
दि‍ल्‍ली हो गई बर्फ़ की सि‍ल्‍ली...
कैसे खेलें डंडा-गि‍ल्‍ली.....
मुम्‍बई है नज़र की झि‍ल्‍ली.....
पलक झपकते नोचे बि‍ल्‍ली.......
द्वार-द्वार पर लगी है कि‍ल्‍ली
पटना आओ मेरी लल्‍ली
हिंया उड़ी न तुम्‍हरी खि‍ल्‍ली
देखे तुमको बरस हुए
जल्‍दी आओ मेरी लल्‍ली
राज़ की बात बताएं तुमको
ठंडी हो रही चि‍कन-चि‍ल्‍ली
आओ-आओ मेरी लल्‍ली

सोमवार, 1 नवंबर 2010

सारी दुनिया गोल गोल

ये कविताएं हमें प्रशांत प्रियदर्शी ने हमें भेजी है. प्रशांत चेन्नै में रहते हैं, आईटी क्षेत्र में कार्यरत हैं, चेहरे की किताब (FB) पर बहुत सक्रिय हैं. उनकी भांजी ने ये कविताएं उन्हें सुनाई थी, जिसे मेरे आग्रह पर उन्होंने हमें भेजा है. आप भी अपनी यादों और अपने आसपास पर नज़र डालें और बच्चों की कविताएं हमें भेज डालें gonujha.jha@gmail.com पर.

नीचे की धरती गोल गोल


ऊपर का चंदा गोल गोल

मम्मी की रोटी गोल गोल

पापा का पैसा गोल गोल

हम भी गोल, तुम भी गोल

सारी दुनिया गोल गोल

- दीदी की बिटिया अप्पू के मुंह से



एक दो,

कभी ना रो.

तीन चार,

रखना प्यार.

पांच छः,

मिलकर रह.

सात आठ,

पढ़ लो पाठ.

नौ दस,

जोर से हँस.

- दीदी की बिटिया अदिति के मुंह से


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