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सोमवार, 14 जुलाई 2008

हो चाँद मामा, चाँद मामा हंसुआ द'

यह समय -सापेक्ष नृत्य -गीत हम सबका बड़ा मनभावन था। इस गीत की खासियत है कि आप इसमें अपने समय, काल व् मांग के अनुसार लाइनें जोड़ सकते हैं। भारत - चीन, भारत -पाकिस्तान युद्ध के समय इसमें लाइनें जोड़ कर खूब-खूब जाता था यह गीत। अभी भी अपनी मांग के अनुसार इसमें जोड़ा जा सकता है।
हो चाँद मामा, चाँद मामा हंसुआ द' ।
सेहो हंसुआ काहे ला?
खडिया कटावे ला
सेहो खडिया काहे ला?
गैयन के खियावे ला।
हो गैयन के खियावे ला खडिया द'
हो चाँद मामा, चाँद मामा हंसुआ द' ।
सेहो गैयन काहे ला?
दूधवा दियावे ला,
सेहो दुधवा काहे ला?
लइकन के पियाबे ला
हो, लइकन के पियाबे ला दूधवा द'
हो चाँद मामा, चाँद मामा हंसुआ द' ।
सेहो लइकन काहे ला?
पाठशाला पढावे ला
सेहो पाठशाला काहे ला?
नागारिकन बनावे ला।
हो नागारिकन बनावे ला पाठशाला द'
हो चाँद मामा, चाँद मामा हंसुआ द' ।
सेहो नागरिक काहे ला?
गेंहुआ बोआबे ला,
सेहो गेंहुआ काहे ला?
सेना के खियाबे ला।
हो सेना के खियाबे ला गेंहुआ द'
हो चाँद मामा, चाँद मामा हंसुआ द' ।
सेहो सेना काहे ला?
देसवन के बचाव ला।
सेहो देसवन काहे ला?
आजादी से रहे ला
हो आजादी से रहे ला देसवन द'
हो चाँद मामा, चाँद मामा हंसुआ द' ।

शनिवार, 12 जुलाई 2008

राधा का मनुहार

कल आपने राधा का ज़ोर और कृष्ण का मनुहार पढा। आज राधा का मनुहार। प्रेम में कोई बड़ा छोटा नहीं होता। प्रेम के ये छोटे-छोटे तत्व जीवन में बड़ा रस घोलते हैं। प्रेम के इस मर्म को जो समझ लेता है, उसके जीवन में सदा अमृत रस बना रहता है। राधा का यह केवल मनुहार ही नहीं, बल्कि अपनी वास्तविकता से कृष्ण कोसाक्षात्कार भी कराना है।

मोरे सर पर गागर भारी
उतार दो गिरिधारी
तुम तो पहने पियर पीताम्बर
मैं पंचरंगिनी साड़ी
उतार दो गिरिधारी
तुम तो बेटे नन्द बाबा के
मैं वृषभानु दुलारी
उतार दो गिरिधारी
तुम तो खाओ माखन मिश्री
मैं दधि बेचनवाली
उतार दो गिरिधारी
मोरे सर पर गागर भारी
उतार दो गिरिधारी।

गुरुवार, 10 जुलाई 2008

सुनो राधे रानी

राधा कृष्ण की छेड़छाड़ गीतों में खूब मुखरित हुई है। बचपन में हम यह गीत गाते थे- नृत्य के साथ इसका माधुर्य और भी बढ़ जाता था। राधा का जोर यहाँ बहुत स्पष्ट दीखता है, और संग- सगं कृष्ण का मनुहार भी।
सुनो राधे रानी दे डालो बाँसुरी मोरी
सुनो जी श्याम ना जानूं बाँसुरी तोरी।
कैसे मैं गाऊँ, राधे, कैसे बजाऊँ,
कैसे बुलाऊँ राधे गैयाँ टोली
मुख से बजाओ कान्हा, मुख से तू गाओ,
हथावन बुलाओ कान्हा, गायन टोली।
सुनो राधे रानी दे डालो बाँसुरी मोरी
सुनो जी श्याम ना जानूं बाँसुरी तोरी।

बुधवार, 9 जुलाई 2008

एक और किसान गीत

बचपन में इस किसान गीत को हम सब नृत्य के साथ गाते थे। आज भी इसका माधुरी बरकरार है-
आम मजरायल, बूंट गजरायल
चहके ला सरसों के फूल हो, चहके ला सरसों के फूल हो,
हँसी हँसी बोले पिया हरबहवा
चल' धनी खेतवा के ओर हो,
चहके ला सरसों के फूल हो।
कनखी से देखे ला छोटका देबरवा
मारले कनवां पे फूल हो,
चहके ला सरसों के फूल हो।
रोही-रोही बोलेले गोदी बलकवा
दिन भर ना मिलेले दूध हो,
चहके ला सरसों के फूल हो,

रविवार, 6 जुलाई 2008

एक किसान गीत

फसल और किसानी से सम्बंधित गीत है यह। इसे हम अपने स्कूल के सांस्कृतिक कार्यक्रम में नृत्य के साथ गाते थे। खेत, खलिहान का एक पूरा दृश्य उभर आता है। आज भी इसे मैं बच्चों के थिएटर वर्कशौप में इसे शामिल करती हूँ। एक ग्रामीण आभा से माहौल भर उठता है।
उठ भौजो भोर भेलई, काटे लागी धान हे,
सतुआ, पियाज भौजो, गठरी में बाँध हे।
नैहरा से आईल भौजो छूटलो न चाल हे,
कांडा chhandaa khol' भौजो, घूघता उघार' हे।
hansuaa dudhaar भौजो, dandavaa mein khos' हे।
jaladi se chal' भौजो khetavaa ke or हे ।
गोदवा के लईका भौजो, पीठिया पे बाँध' हे,
झटपट धान रोप', पनिया पियाब' हे।

गुरुवार, 3 जुलाई 2008

और एक प्रार्थना

स्वप्निल यह कविता स्कूलजाने से पहले जोर-जोर से बोलता था। उसकी नानी कहती हैं कि वह यह कविता वह अपनी डेढ़ साल की उम्र में ही बोलने लगा था। यह एक प्रार्थना है। स्वप्निल की शादी ११ जुलाई को हो रही है। उसे बधाई देते हुए उसी की बोली यह प्रार्थना-

हे भगवान, हे भगवान

हम सब बालक हैं नादाँ

बुरी बात से हमें बचाना

खूब पढाना, खूब लिखाना

हमें सहारा देते रहना

ख़बर हमारी लेते रहना

चरणों में हम पड़े हुए हैं

हाथ जोरकर खड़े हुए हैं

विद्या बुद्धि कुछ नहीं पास

हमें बना लो अपना दास।

लो हम शीश झुकाते हैं

विद्या पढ़ने जाते हैं।

रविवार, 29 जून 2008

एक खेल-कविता- तैरते हुए

एक कविता यह भी। ज़रा खेल के मूड में आइये और मजे लीजिए। यह खेल पानी में खेला जाता था। तब हम छोटे थे। घर के पीछे के तालाब में नहाना उअर तैरना हम सभी भाई- बहनों का शगल था, जूनून की हद तक। इस खेल को पानी में तैरते हुए ही खेला जाता था। प्रश्नोत्तरी अंदाज़ में-

तनी खुद्दी देबे? (ज़रा टूटे चावल दोगी?)

कथी ला? (किसलिए?)

परबा ला (कबूतर के लिए)

तोहर परबा मरि गेलौ (तुम्हारा कबूतर तो मर गया)

के कहलकौ? (किसने कहा?)

धोबिया (धोबी ने)

छाती पीटि के मरि जाऊ? (छाती पीट कर मर जाऊं?)

मर जो (मर जाओ)

और इसके बाद उत्तरदाता कस कर अपने सीने पर दो हत्तर लगाते हुए पीठ के बल तैरते हुए दूर-दूर तक निकल जाता। इस तैरने में वह अपने सारे अंग निश्चेष्ट रखता, जैसे कोई लाश बही जा रही हो। यह इतना मजेदार खेल होता की बस।