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बुधवार, 4 जून 2008

मेरी गुडिया पडी बीमार

डॉक्टर पर एक और कविता- गीत । बचपन में हमारे स्कूल में होनेवाले साप्ताहिक सांस्कृतिक कार्यक्रमों में यह गीत एक अंतराल पर अनिवार्य रूप से आ जाता था। आज अपने थिएटर वर्क्शौप में जब बच्चे इसे प्रस्तुत करते हैं तो dekhanevaale मुस्काए बिना नहीं रह पाते। आप भी इसका आनंद लें।)



डॉक्टर देखो bhalii प्रकार
मेरी गुडिया पडी बीमार
आया, बरसा, छम-छम पानी
उसमें भीगी हदिया रानी
गीली कपडे दिए उतार
फ़िर भी गुडिया पडी बीमार

ओहो, इसको तेज बुखार
सौ से ऊपर डिग्री चार
दवा की है ये चार खुराक
सुबह-दोपहर-शाम और रात
फीस लगेगी हर इक बार
आज नगद और कल हो उधार
फीस?
जबतक गुडिया रहे बीमार
tab तक पैसा रहे उधार।

सोमवार, 2 जून 2008

डॉक्टर से २ कवितायेँ

डॉक्टर पर २ कवितायेँ। १ स्वप्निल ने भेजी तो एक मुझे भी याद आ गई। यह मेरी बेटी कोशी अपने छुटपन में गा-गा कर मुझे सुनाती थी। आप सब भी देखें-

"नीम्बू की प्लेट में
आम का अचार है
बुड्ढा नाराज़ है
बुढ़िया बीमार है
आ जा मेरे डॉक्टर, तेरा इंतज़ार है।"
- स्वप्निल

"आज सोमवार है
गुडिया को बुखार है
गुडिया गई डॉक्टर के पास
डॉक्टर ने मारी सुई
गुडिया रोई- उई, उई, उई।"

रविवार, 1 जून 2008

१,२,१०

स्वप्निल कि भेजी एक और कविता-

"१,२,१०
ऊपर से आई बस
बस ने मारी सीती
ऊपर से आया टीटी
टीटी ने काटी पर्ची
ऊपर से आया दर्जी
दर्जी ने सिली पैंट
ऊपर से आया टैंक
टंक ने मारा गोला
मेरा रंग दे बसंती चोला
- स्वप्निल

गुरुवार, 29 मई 2008

ABC

बचपन कि एक कविता यह भी-

एबीसी
कहं गई थी?
कुत्ते कि झ्पोअदी में सो गई थी
कुत्ते ने काट लिया
रो रही थी
पापा ने पैसे दिए
हंस ताही थी
मामी ने तौफी दी,
खा रही थी,
bhaiyaa ने जीभ दिखाई
चिढ रही थी
दीदी ने दुलार किया
मस्त हो रही थी।

सैनिक

स्वप्निल ने अपने बचपन में सुनी कविताओं में से कुछ भेजी हैं। यह एक कविता उसने भेजी तो, लेकिन इसकी एक लाइन वह भूल गया है। हम उस लाइन के बिना ही इस कविता को दे रहे हैं, इस विश्वास के साथ कि आप में से कोई इस लाइन को पूरी कर दे।

हम सैनिक हैं, हम सैनिक हैं
लाराने को रण में जायेंगे
कुछ अपने हाथ दिखाएँगे
हम शूरवीर कहलायेंगे

घमासान हम समर करेंगे
नम जगत में अमर करेंगे
हम -सा ना बहादुर कोई है
जो कहते कर दिखालायेंगे
-------------------------- (अपूर्ण pankti)
रिपुओं के छक्के छुडायेंगे
- स्वप्निल

मंगलवार, 27 मई 2008

इंडिया गेट पे दो सिपाही

अभी- अभी दो दिन पहले दिल्ली के इंडिया गेट पर गई थी। वहाँ पहुँची कि हठात में सुनी यह कविता मुंह से फ़ुट परी। आपके लिए भी हाजिर है-

मोटू सेठ,
सड़क पर लेट
गाडी आई,
फट गया पेट
गाडी का नंबर २८
गाडी पहुँची
इंडिया गेट
इंडिया गेट पे सिपाही
मोटू जी की खूब पिटाई

शुक्रवार, 16 मई 2008

मेरा डिसीजन जानो मम्मी

मम्मी पीछे पडो ना मेरे, मुझको पढ़ना आता है,

पास करेंगे, मार्क्स मिलेंगे, मन फ़िर क्यों घबड़ता है?

हिस्ट्री, हिन्दी, साइंस, इंग्लिश, भूला नहीं मुझे कुछ भी,

फ़िर भी मेरी चिंता में, रात-रात तुम सोती नहीं,

टेंशन, लफड़े क्यों लेती हो, मैं हूँ पूरा जिम्मेदार,

पीठ पे मेरी ना तो बैठो, ना हो मेरे सर पे सवार,

अभी तो हू चौथी में, अभी से क्यों भेजो मुझको ट्यूशन?

छठवीं तक तो तुम ही पधाओगी , है ये मेरा डिसीजन।

पापा, अच्छे मार्क्स हैं आए, लाओ झट से मेरा गिफ्ट,

वादेवाला ही लाना, वादे से होना ना शिफ्ट

अभी है छुट्टी, अभी ना पढ़ना, फुल एन्जॉय करना है,

लो ना मामी तुम भी छुट्टी, गर्ल्स-ब्याय का कहना है।