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शनिवार, 13 जून 2009

पुरानी यादे ताज़ा करो।

मेरे अनुरोध पर सोनाली सिंह ने अपने बचपन के पिटारे से कुछ कवितायें भेजी हैं। सोनाली सिंह हिन्दी की युवा कथा लेखक हैं। इनकी अभी-अभी एक कहानी "हंस" के मई, २००९ अंक में छपी है- "क्यूतीपाई । आप भी अपने यादों के पिटारे से कवितायें भेजें- gonujha.jha@gmail.com पर।

पुरानी यादे ताज़ा करो।

1।) मछली जल की रानी है,

जीवन उसका पानी है।

हाथ लगाओ डर

जायेगीबाहर निकालो मर जायेगी।

2।) पोशम्पा भाई पोशम्पा,

सौ रुपये की घडी चुराई।

अब तो जेल मे जाना पडेगा,

जेल की रोटी खानी पडेगी,

जेल का पानी पीना पडेगा।

थै थैयाप्पा थुशमदारी बाबा खुश।

3।) झूठ बोलना पाप है,

नदी किनारे सांप है।

काली माई आयेगी,

तुमको उठा ले जायेगी।

4।) आज सोमवार है,

चूहे को बुखार है।

चूहा गया डाक्टर के पास,

डाक्टर ने लगायी सुई,

चूहा बोला उईईईईई।

5।) आलू-कचालू बेटा कहा गये थे,

बन्दर की झोपडी मे सो रहे थे।

बन्दर ने लात मारी रो रहे थे,

मम्मी ने पैसे दिये हंस रहे थे।

6।) तितली उडी, बस मे चढी।

सीट ना मिली,तो रोने लगी।

ड्राईवर बोला आजा मेरे पास,

तितली बोली " हट बदमाश "।

शुक्रवार, 30 जनवरी 2009

जालिम सरकार मिटायेंगे

उत्तर प्रदेश के इटावा शहर के छिपती मुहल्ले में ९ अक्टूबर, १९०५ को जन्मे छैलबिहारी दीक्षित 'कंटक' हिन्दी के संभवत: पहले ऐसे कवि थे, जो कविता लिखने के कारण जेल गए। तब अंग्रेजों का दमन चक्र जोरों पर था और इनकी लेखनी में एक आग थी, जिसकी आंच से ब्रिटिश नहीं बच सके। फ़िर तो उनके ऊपर राजद्रोह का आरोप लगाकर इनकी तीन कविताओं को राजद्रोही करार दिया गया और प्रत्येक कविता के लिए अलग-अलग एक-एक वर्ष की सज़ा सुनाई गई। बाद में तो जेल इनके लिए दूसरा घर हो गया। नवनीत पत्रिका के अगस्त, २००८ के अंक में छैलबिहारी दीक्षित पर एक पूरी सामग्री दी हुई है। यहीं पर वह कविता भी, जिसके कारण 'कंटक' जी को पहली बार जेल जाना पडा। आप भी यह कविता देखें। चाहे तो इसे आज के सन्दर्भ में भी देख सकते हैं।

वेदी पर शीश चधायेंगे,
जालिम सरकार मिटायेंगे।
जोशीले गाने गाने दो, आफत पर आफत आने दो,
सर जाता है तो जाने दो, लेकिन मत क़दम हटाने दो,
जीवन की ज्योति जगायेंगे
हम बलिवेदी पर जायेंगे,
जालिम सरकार मिटायेंगे।

बज रहा बिगुल आजादी का, बाना पहिना है खादी का,
है मोह न हमको गाडी का, डर यहाँ किसे बर्बादी का,
जेलों में अलख जगायेंगे,
हम बलिवेदी पर जायेंगे,
जालिम सरकार मिटायेंगे।

मन के सुख-दुःख की लड़ियों का, भय छोड़ चलो फुलाझादियों का,
स्वागत कर लो हथाकादियों का, जीने-मरने की घड़ियों का,
प्राणों की भेंट चधायेंगे,
हम बलिवेदी पर जायेंगे,
जालिम सरकार मिटायेंगे।

सुनकर संघर्षों की बोली, बढ़ चली शहीदों की टोली,
है अंधाधुंध चलती गोली, निर्भय सबने छाती खोली,
भारत स्वाधीन बनायेंगे,
हम बलिवेदी पर जायेंगे,
जालिम सरकार मिटायेंगे।

मुठभेड़ बीच में मत छोडो, ज़ंजीर गुलामी की तोडो,
भारत माँ से नाता जोडो, डर से डर कर मुंह मत मोडो,
गौरव स्वदेश का गायेंगे,
हम बलिवेदी पर जायेंगे,
जालिम सरकार मिटायेंगे।
- साभार, नवनीत

मंगलवार, 20 जनवरी 2009

स्वतंत्रता

स्व राम नरेश त्रिपाठी की यह रचना अपने स्वतन्त्र व्यक्तित्व की बात कहती है। सन १८८६ में जन्मे इस कवि के मन में आजादी की ललक कैसी रही होगी, यह सहज ही समझा जा सकता है। १९६२ में, देश जब तरह-तरह क्र परिवर्तनों के दौर से गुजर रहा था, तब इस कवि को मौत ने अपने पास बुला लिया। प्रस्तुत है उनकी यह कविता। २६ जनवरी यानी हमारा गणतंत्र दिवस पास में है। यह कविता ऐसे में और भी मौजू हो जाती है, ख़ास कर आज के समय में।

एक घडी की भी परवशता कोटि नरक के सम है
पल भर की भी स्वतंत्रता सौ स्वर्गों से उत्तम है।
जब तक जग में मान तुम्हारा तब तक जीवन धारो,
जब तक जीवन है शरीर में, तब तक धर्म न हारो।
जब तक धर्म, तभी तक सुख है, सुख में कर्म न भूलो,
कर्म भूमि में न्याय मार्ग पर छाया बन कर फूलो।
जहाँ स्वतन्त्र विचार न बदलें मन से आकर मुख में,
बने न बाधक शक्तिमान जन जहाँ निर्बल के सुख में
निज उन्नति का जहाँ सभी जन को अवसर समान हो
शान्तिदायिनी निशा और आनंद भरा वासर हो
उसी सुखी स्वाधीन देश में मित्रो! जीवन धारो
अपने चारु चरित से जग में प्राप्त करो फल चारो।
- साभार, राम नरेश त्रिपाठी

धरती स्वर्ग समान है.

आज पढ़ते-पढ़ते अचानक गोपाल दास सक्सेना 'नीरज' की यह कविता हाथ लगी। नीरज जी बहुत अच्छे कवि व गीतकार हैं, जिनका सम्मान हिन्दी साहित्य ने अपनी गुटबंदी के कारण नहीं किया। मगर वे इसके मुन्हाताज़ न हो कर अपनी रचना प्रक्रिया में लीं रहते आए हैं। यह कविता उनके प्रति पूरे आदर व् सम्मान व्यक्त करते हुए ली जा रही है।

जाती-पाती से बड़ा धर्म है
धर्म-ध्यान से बड़ा कर्म है
कर्मकांड से बड़ा मर्म है
मगर सभी से बड़ा यहाँ यह छोटा सा इंसान है,
और अगर वह प्यार करे तो धरती स्वर्ग समान है।

जितनी देखी, दुनिया सबकी, देखी दुल्हन ताले में,
कोई क़ैद पडा मस्जिद में, कोई बंद शिवाले में
किसको अपना हाथ थमा दूँ, किसको अपना मन दे दूँ
कोई लुटे अंधियारे में, कोई ठगे उजाले में

सबका अलग-अलग थान - गन है
सबका अलग-अलग वंदन है
सबका अलग-अलग चंदन है
लेकिन सबके सर के ऊपर नीला एक वितान है
फ़िर क्यों जाने यह सारी धरती लहू-लुहान है?
हर खिड़की पर परदे घायल आँगन हर दीवारों से
किस दरवाजे करून वन्दना, किस देहरी मत्था टेकून
काशी में अंधियारा सोया, मथुरा पटी बाज़ारों से,
हर घुमाव पर छीन-झपट है
इधर प्रेम तो उधर कपट है
झूठ किए सच का घूंघट है
फ़िर भी मनुज अश्रु की गंगा, अबतक पावन प्राण है
और नहा ले उसमें तो फ़िर माना ही भगवान है।
- नीरज

सोमवार, 24 नवंबर 2008

बहुत दिनों तक चूल्हा रोया

इस बार एक कविता बाबा नागार्जुन की। इसे मैंने अपनी बड़ी बिटिया तोषी को सिखाया था, जब वह ६ या ७ साल की थी। उसने अपने स्कूल में इसे सुनाया था। इस कविता की खासियत यह है की यह हर उम्र, हर वक़्त, हर काल के लिए माजून हाय। इस कविता की एक और खासियत है की इसमे किसी भी विराम चिन्ह का बाबा ने प्रयोग नही किया है। उनका कहना है की यह कविता समय व् काल से परे है। विराम चिन्ह इसे एक ठहराव देता, जबकि यह स्थिति एक कालातीत सत्य है। यहाँ इसे बिना विराम चिन्ह के ही प्रस्तुत किया जा रहा है, बाबा के प्रति अपनी श्रद्धा प्रकट करते हुए। आप अभी भी अपनी पिटारी खोलें और कवितायें bhejen gonujha.jha@gmail.com पर ।

बहुत दिनों तक चूल्हा रोया चक्की रही उदास
बहुत दिनों तक कानी कुतिया सोई उसके पास
बहुत दिनों तक लगी भीत पर छिपकलियों की गश्त
बहुत दिनों तक चूहों की भी हालत रही शिकस्त
दाने आए घर के अन्दर बहुत दिनों के बाद
धुंआ उठा आँगन के ऊपर बहुत दिनों के बाद
कव्वों ने खुजलाई पांखें बहुत दिनों के बाद
चमक उठीं घर भर की आँखें बहुत दिनों के बाद
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शुक्रवार, 21 नवंबर 2008

सड़क सुहानी

सी बी टी की किताब से एक और कविता । आप भी अपनी पिटारी खोलें और कवितायें bhejen gonujha.jha@gmail.com पर ।

लम्बी-चौडी सड़क सुहानी,
भेद न रखती ग्राम-नगर में
साथिन बनाती रोज़ सफर में,
सच्चे मन से सेवा करती,
लम्बी-चौडी सड़क सुहानी।

कहीं-कहीं बल खाती जाती,
कहीं-कहीं सीधा पहुंचाती,
कभी न करती है नादानी,
लम्बी-चौडी सड़क सुहानी।

साभार, रमाकांत दीक्षित

बुधवार, 19 नवंबर 2008

गुडिया रोई मुन्नी रोई

यह कविता रेखा दी ने अपनी यादों की पिटारी से निकाल कर हमें दी है। आप भी अपनी पिटारी खोलें और कवितायें bhejen gonujha.jha@gmail.com पर


नन्हीं मुन्नी ओढे चुन्नी
गुडिया खूब सजाई है,
किस गुड्डे के साथ हुई
इसकी आज सगाई है.
रंग बिरंगी ओढे चुनरिया
माथे पर चमके है बिंदिया
खन-खन खनके हाथ के कंगना
अब छोड़ चली मुन्नी का अंगना .

गुडिया रोई मुन्नी रोई
संग संग सखी सहेली रोईं
कल ही चल देगी यह तो
सोच सोच कर अखियाँ धोईं ।

-साभार, रेखा श्रीवास्तव