This blog is "Poetry meant for Children" so that children of all age group can pick up their favorite from here. You may also participate. Send poems, written or heard by you on gonujha.jha@gmail.com. poems will be published with your name.
मंगलवार, 20 जनवरी 2009
स्वतंत्रता
एक घडी की भी परवशता कोटि नरक के सम है
पल भर की भी स्वतंत्रता सौ स्वर्गों से उत्तम है।
जब तक जग में मान तुम्हारा तब तक जीवन धारो,
जब तक जीवन है शरीर में, तब तक धर्म न हारो।
जब तक धर्म, तभी तक सुख है, सुख में कर्म न भूलो,
कर्म भूमि में न्याय मार्ग पर छाया बन कर फूलो।
जहाँ स्वतन्त्र विचार न बदलें मन से आकर मुख में,
बने न बाधक शक्तिमान जन जहाँ निर्बल के सुख में
निज उन्नति का जहाँ सभी जन को अवसर समान हो
शान्तिदायिनी निशा और आनंद भरा वासर हो
उसी सुखी स्वाधीन देश में मित्रो! जीवन धारो
अपने चारु चरित से जग में प्राप्त करो फल चारो।
- साभार, राम नरेश त्रिपाठी
धरती स्वर्ग समान है.
जाती-पाती से बड़ा धर्म है
धर्म-ध्यान से बड़ा कर्म है
कर्मकांड से बड़ा मर्म है
मगर सभी से बड़ा यहाँ यह छोटा सा इंसान है,
और अगर वह प्यार करे तो धरती स्वर्ग समान है।
जितनी देखी, दुनिया सबकी, देखी दुल्हन ताले में,
कोई क़ैद पडा मस्जिद में, कोई बंद शिवाले में
किसको अपना हाथ थमा दूँ, किसको अपना मन दे दूँ
कोई लुटे अंधियारे में, कोई ठगे उजाले में
सबका अलग-अलग थान - गन है
सबका अलग-अलग वंदन है
सबका अलग-अलग चंदन है
लेकिन सबके सर के ऊपर नीला एक वितान है
फ़िर क्यों जाने यह सारी धरती लहू-लुहान है?
हर खिड़की पर परदे घायल आँगन हर दीवारों से
किस दरवाजे करून वन्दना, किस देहरी मत्था टेकून
काशी में अंधियारा सोया, मथुरा पटी बाज़ारों से,
हर घुमाव पर छीन-झपट है
इधर प्रेम तो उधर कपट है
झूठ किए सच का घूंघट है
फ़िर भी मनुज अश्रु की गंगा, अबतक पावन प्राण है
और नहा ले उसमें तो फ़िर माना ही भगवान है।
- नीरज
सोमवार, 24 नवंबर 2008
बहुत दिनों तक चूल्हा रोया
बहुत दिनों तक चूल्हा रोया चक्की रही उदास
बहुत दिनों तक कानी कुतिया सोई उसके पास
बहुत दिनों तक लगी भीत पर छिपकलियों की गश्त
बहुत दिनों तक चूहों की भी हालत रही शिकस्त
दाने आए घर के अन्दर बहुत दिनों के बाद
धुंआ उठा आँगन के ऊपर बहुत दिनों के बाद
कव्वों ने खुजलाई पांखें बहुत दिनों के बाद
चमक उठीं घर भर की आँखें बहुत दिनों के बाद
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शुक्रवार, 21 नवंबर 2008
सड़क सुहानी
लम्बी-चौडी सड़क सुहानी,
भेद न रखती ग्राम-नगर में
साथिन बनाती रोज़ सफर में,
सच्चे मन से सेवा करती,
लम्बी-चौडी सड़क सुहानी।
कहीं-कहीं बल खाती जाती,
कहीं-कहीं सीधा पहुंचाती,
कभी न करती है नादानी,
लम्बी-चौडी सड़क सुहानी।
साभार, रमाकांत दीक्षित
बुधवार, 19 नवंबर 2008
गुडिया रोई मुन्नी रोई
यह कविता रेखा दी ने अपनी यादों की पिटारी से निकाल कर हमें दी है। आप भी अपनी पिटारी खोलें और कवितायें bhejen gonujha.jha@gmail.com पर
नन्हीं मुन्नी ओढे चुन्नी
गुडिया खूब सजाई है,
किस गुड्डे के साथ हुई
इसकी आज सगाई है.
रंग बिरंगी ओढे चुनरिया
माथे पर चमके है बिंदिया
खन-खन खनके हाथ के कंगना
अब छोड़ चली मुन्नी का अंगना .
गुडिया रोई मुन्नी रोई
संग संग सखी सहेली रोईं
कल ही चल देगी यह तो
सोच सोच कर अखियाँ धोईं ।
-साभार, रेखा श्रीवास्तव
सोमवार, 17 नवंबर 2008
एक अजूबा हमने देखा
svapnil ne bahut din baad ek kavitaa bhejii hai-
एक अजूबा हमने देखा
कुएं में लग गई आग
पानी पानी जर गओ,
मछरी खेलें फाग
नाव में नदिया डूबी जाए
एक अजूबा हमने देखा
कुँए में लग गई आग
पानी पानी जर गओ,
मछरी खेलें फाग
नांव में नदिया डूबी जाये
-स्वप्निल
रविवार, 16 नवंबर 2008
मूंछें ताने पहुंचे थाने
चूहे जी इक रपट लिखाने
बिल्ली मौसी हवलदार थीं,
एक-दो नहीं, तीन-चार थीं,
पहली ने चूहे को डांटा,'
दूजी ने मारा इक चांटा,
बढीं तीसरी आँखें मींचे,
चौथी दौडीं मुट्ठी भींचे,
काँप उठे चूहे जी थार-थार,
सरपट भागे अपने घर पर,
फिरते हैं अबतक घबराए
लौट के बुद्धू घर को आए।
साभार- प्रकाश पुरोहित