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मंगलवार, 20 जनवरी 2009

स्वतंत्रता

स्व राम नरेश त्रिपाठी की यह रचना अपने स्वतन्त्र व्यक्तित्व की बात कहती है। सन १८८६ में जन्मे इस कवि के मन में आजादी की ललक कैसी रही होगी, यह सहज ही समझा जा सकता है। १९६२ में, देश जब तरह-तरह क्र परिवर्तनों के दौर से गुजर रहा था, तब इस कवि को मौत ने अपने पास बुला लिया। प्रस्तुत है उनकी यह कविता। २६ जनवरी यानी हमारा गणतंत्र दिवस पास में है। यह कविता ऐसे में और भी मौजू हो जाती है, ख़ास कर आज के समय में।

एक घडी की भी परवशता कोटि नरक के सम है
पल भर की भी स्वतंत्रता सौ स्वर्गों से उत्तम है।
जब तक जग में मान तुम्हारा तब तक जीवन धारो,
जब तक जीवन है शरीर में, तब तक धर्म न हारो।
जब तक धर्म, तभी तक सुख है, सुख में कर्म न भूलो,
कर्म भूमि में न्याय मार्ग पर छाया बन कर फूलो।
जहाँ स्वतन्त्र विचार न बदलें मन से आकर मुख में,
बने न बाधक शक्तिमान जन जहाँ निर्बल के सुख में
निज उन्नति का जहाँ सभी जन को अवसर समान हो
शान्तिदायिनी निशा और आनंद भरा वासर हो
उसी सुखी स्वाधीन देश में मित्रो! जीवन धारो
अपने चारु चरित से जग में प्राप्त करो फल चारो।
- साभार, राम नरेश त्रिपाठी

धरती स्वर्ग समान है.

आज पढ़ते-पढ़ते अचानक गोपाल दास सक्सेना 'नीरज' की यह कविता हाथ लगी। नीरज जी बहुत अच्छे कवि व गीतकार हैं, जिनका सम्मान हिन्दी साहित्य ने अपनी गुटबंदी के कारण नहीं किया। मगर वे इसके मुन्हाताज़ न हो कर अपनी रचना प्रक्रिया में लीं रहते आए हैं। यह कविता उनके प्रति पूरे आदर व् सम्मान व्यक्त करते हुए ली जा रही है।

जाती-पाती से बड़ा धर्म है
धर्म-ध्यान से बड़ा कर्म है
कर्मकांड से बड़ा मर्म है
मगर सभी से बड़ा यहाँ यह छोटा सा इंसान है,
और अगर वह प्यार करे तो धरती स्वर्ग समान है।

जितनी देखी, दुनिया सबकी, देखी दुल्हन ताले में,
कोई क़ैद पडा मस्जिद में, कोई बंद शिवाले में
किसको अपना हाथ थमा दूँ, किसको अपना मन दे दूँ
कोई लुटे अंधियारे में, कोई ठगे उजाले में

सबका अलग-अलग थान - गन है
सबका अलग-अलग वंदन है
सबका अलग-अलग चंदन है
लेकिन सबके सर के ऊपर नीला एक वितान है
फ़िर क्यों जाने यह सारी धरती लहू-लुहान है?
हर खिड़की पर परदे घायल आँगन हर दीवारों से
किस दरवाजे करून वन्दना, किस देहरी मत्था टेकून
काशी में अंधियारा सोया, मथुरा पटी बाज़ारों से,
हर घुमाव पर छीन-झपट है
इधर प्रेम तो उधर कपट है
झूठ किए सच का घूंघट है
फ़िर भी मनुज अश्रु की गंगा, अबतक पावन प्राण है
और नहा ले उसमें तो फ़िर माना ही भगवान है।
- नीरज

सोमवार, 24 नवंबर 2008

बहुत दिनों तक चूल्हा रोया

इस बार एक कविता बाबा नागार्जुन की। इसे मैंने अपनी बड़ी बिटिया तोषी को सिखाया था, जब वह ६ या ७ साल की थी। उसने अपने स्कूल में इसे सुनाया था। इस कविता की खासियत यह है की यह हर उम्र, हर वक़्त, हर काल के लिए माजून हाय। इस कविता की एक और खासियत है की इसमे किसी भी विराम चिन्ह का बाबा ने प्रयोग नही किया है। उनका कहना है की यह कविता समय व् काल से परे है। विराम चिन्ह इसे एक ठहराव देता, जबकि यह स्थिति एक कालातीत सत्य है। यहाँ इसे बिना विराम चिन्ह के ही प्रस्तुत किया जा रहा है, बाबा के प्रति अपनी श्रद्धा प्रकट करते हुए। आप अभी भी अपनी पिटारी खोलें और कवितायें bhejen gonujha.jha@gmail.com पर ।

बहुत दिनों तक चूल्हा रोया चक्की रही उदास
बहुत दिनों तक कानी कुतिया सोई उसके पास
बहुत दिनों तक लगी भीत पर छिपकलियों की गश्त
बहुत दिनों तक चूहों की भी हालत रही शिकस्त
दाने आए घर के अन्दर बहुत दिनों के बाद
धुंआ उठा आँगन के ऊपर बहुत दिनों के बाद
कव्वों ने खुजलाई पांखें बहुत दिनों के बाद
चमक उठीं घर भर की आँखें बहुत दिनों के बाद
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शुक्रवार, 21 नवंबर 2008

सड़क सुहानी

सी बी टी की किताब से एक और कविता । आप भी अपनी पिटारी खोलें और कवितायें bhejen gonujha.jha@gmail.com पर ।

लम्बी-चौडी सड़क सुहानी,
भेद न रखती ग्राम-नगर में
साथिन बनाती रोज़ सफर में,
सच्चे मन से सेवा करती,
लम्बी-चौडी सड़क सुहानी।

कहीं-कहीं बल खाती जाती,
कहीं-कहीं सीधा पहुंचाती,
कभी न करती है नादानी,
लम्बी-चौडी सड़क सुहानी।

साभार, रमाकांत दीक्षित

बुधवार, 19 नवंबर 2008

गुडिया रोई मुन्नी रोई

यह कविता रेखा दी ने अपनी यादों की पिटारी से निकाल कर हमें दी है। आप भी अपनी पिटारी खोलें और कवितायें bhejen gonujha.jha@gmail.com पर


नन्हीं मुन्नी ओढे चुन्नी
गुडिया खूब सजाई है,
किस गुड्डे के साथ हुई
इसकी आज सगाई है.
रंग बिरंगी ओढे चुनरिया
माथे पर चमके है बिंदिया
खन-खन खनके हाथ के कंगना
अब छोड़ चली मुन्नी का अंगना .

गुडिया रोई मुन्नी रोई
संग संग सखी सहेली रोईं
कल ही चल देगी यह तो
सोच सोच कर अखियाँ धोईं ।

-साभार, रेखा श्रीवास्तव

सोमवार, 17 नवंबर 2008

एक अजूबा हमने देखा

svapnil ne bahut din baad ek kavitaa bhejii hai-


एक अजूबा हमने देखा

कुएं में लग गई आग

पानी पानी जर गओ,

मछरी खेलें फाग

नाव में नदिया डूबी जाए
एक अजूबा हमने देखा

कुँए में लग गई आग
पानी पानी जर गओ,

मछरी खेलें फाग

नांव में नदिया डूबी जाये

-स्वप्निल

रविवार, 16 नवंबर 2008

सीबीटी की कविता की किताब से कुछ कवितायें उनके रचनाकारों के नाम के साथ, आभार सहित। हमें आपकी बचपन में सुनी कविताओं का इंतज़ार है। अपने बचपन की सुनी कवितायें आप हमें ज़रूर भेजें- gonujha.jha@gmail.com पर।

मूंछें ताने पहुंचे थाने
चूहे जी इक रपट लिखाने
बिल्ली मौसी हवलदार थीं,
एक-दो नहीं, तीन-चार थीं,
पहली ने चूहे को डांटा,'
दूजी ने मारा इक चांटा,
बढीं तीसरी आँखें मींचे,
चौथी दौडीं मुट्ठी भींचे,
काँप उठे चूहे जी थार-थार,
सरपट भागे अपने घर पर,
फिरते हैं अबतक घबराए
लौट के बुद्धू घर को आए।

साभार- प्रकाश पुरोहित