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सोमवार, 17 नवंबर 2008

एक अजूबा हमने देखा

svapnil ne bahut din baad ek kavitaa bhejii hai-


एक अजूबा हमने देखा

कुएं में लग गई आग

पानी पानी जर गओ,

मछरी खेलें फाग

नाव में नदिया डूबी जाए
एक अजूबा हमने देखा

कुँए में लग गई आग
पानी पानी जर गओ,

मछरी खेलें फाग

नांव में नदिया डूबी जाये

-स्वप्निल

रविवार, 16 नवंबर 2008

सीबीटी की कविता की किताब से कुछ कवितायें उनके रचनाकारों के नाम के साथ, आभार सहित। हमें आपकी बचपन में सुनी कविताओं का इंतज़ार है। अपने बचपन की सुनी कवितायें आप हमें ज़रूर भेजें- gonujha.jha@gmail.com पर।

मूंछें ताने पहुंचे थाने
चूहे जी इक रपट लिखाने
बिल्ली मौसी हवलदार थीं,
एक-दो नहीं, तीन-चार थीं,
पहली ने चूहे को डांटा,'
दूजी ने मारा इक चांटा,
बढीं तीसरी आँखें मींचे,
चौथी दौडीं मुट्ठी भींचे,
काँप उठे चूहे जी थार-थार,
सरपट भागे अपने घर पर,
फिरते हैं अबतक घबराए
लौट के बुद्धू घर को आए।

साभार- प्रकाश पुरोहित

सोमवार, 10 नवंबर 2008

जिनके बिगड़ल बा चलनियां तोड़ दे टंगडी

टहलने के फायदे को ध्यान में रखकर यह गीत लिखा गया था बच्चों के लिए। आप भी अपने बच्चों को इसे सिखा सकते हैं। और हाँ, अपने बचपन की सुनी कवितायें आप हमें ज़रूर भेजें- gonujha.jha@gmail.com पर।
कैसे संभले जिंदगानी, पूछे नगरी,
पूछे नगरी, हो रामा पूछे नगरी,
जिनके बिगड़ल बा चलनियां तोड़ दे टंगडी
हो मारो झाडू आ बधानियाँ, तोड़ दे टंगडी।
घुटने, कमर लेके बैठे क्यों हो मेरे भाई
चलना सीखो मील-मील भर, मत खाओ मिठाई
वरना, जिंदगी बन जायेगी, तुम्हारी गठडी
हो तुम्हारी गठडी हो तुम्हारी गठडी
जिनके बिगड़ल बा चलनियां तोड़ दे टंगडी ।
जल ही जीवन, जीवन -धारा, धारा चलती रहती
समय भी चलता, दिन भी चलते, रात भी चलती रहती
तुम भी चल दो उठ के वरना कम जायेगी शक्ति
हो कम जायेगी शक्ति, हो कम जायेगी शक्ति
जिनके बिगड़ल बा चलनियां तोड़ दे टंगडी ।
शुद्ध साफ़ औक्सीजन भर लो साँस के इंजन में,
कर दो भस्म, घूम के, कोलेस्ट्रौल सीने में
फूलों जैसी हो जायेगी, जीवन की पगडी
हो जीवन की पगडी हो जीवन की पगडी
ऐसे संभले जिंदगानी सुनो री नगरी।

बुधवार, 5 नवंबर 2008

चंदा मामा दूर के,

यह कविता भी हमें रेखा दी के सौजन्य से मिली है। हालांकि यह बहुत पुरानी कविता है और लगभग सभी को पाता है, फ़िर भी इसे यहाँ देने का अपना लुत्फ़ है।
चंदा मामा दूर के,
पुए पकाए गुड के ,
आप खाए थाली में,
मुन्ने को दें प्याली में,
प्याली गयी टूट,
मुन्ना गया रूठ,
हम नयी प्याली लायेंगे,
मुन्ने को मनाएंगे,
बजाकर बजाकर तालियाँ ,
मुन्ने को खिलाएंगे.

गुरुवार, 30 अक्टूबर 2008

एक सफ़ेद कबूतर

इस बार एक कविता हर्ष की, जिसे उनके ब्लॉग से लेकर इधर दे रही हूँ आप सबके लिए।

एक सफ़ेद कबूतर,

उसके दो पर,

एक इधर,

एक उधर।

दो व्यक्ति,

पहने हुए,

सफ़ेद धोती,

सफ़ेद कुर्ता,सफ़ेद टोपी,

एक सफ़ेद कबूतर के इधर,

एक उधर,

नोचने को तैयार,

सफ़ेद कबूतर के पर।

अगली सुबह,

सफ़ेद कबूतर माँग रहा था प्राणों की भीख,

बेचारा चिल्लाय भी तो कैसे,

चिल्लाना शोभा नहीं देता उसे,

जो हो शांति का प्रतीक।

-हर्ष

सोमवार, 27 अक्टूबर 2008

देश के सच्चे सपूत कहाना

छुटपन की कवितायें के लिए मैंने रेखा दी से अनुरोध किया। वे मान गई और अपने बचपन की एक कविता लिख के भेजी है, जिसे आपको पेश कर रही हूँ। आप भी हमे अपने बचपन में सुनी कवितायें भेजें, ताकि हमारी नन्ही पीढी इन्हें दुहरा सकें। कवितायें gonujha.jha@gmail.com पर भेजें।

"यह कविता मैंने बचपन में जब १९६२ में चीन की लडाई चल रही थी तो अपने स्कूल में पढ़ी थी १५ अगस्त को।"

सीमा को जाता है भाई,

बहन बधाई देने आई,

आंसू अपने रोक न पाई,

फिर भी यह कहकर मुस्काई।

देखो भैया वचन निभाना,

पीठ दिखा कर भाग न आना,

देख रहा है तुम्हें जमाना,

मत माता का दूध लजाना।

दुश्मन को तुम जाके भागना,

भारत माँ की लाज बचाना,

सीना चौडा करके आना,

देश के सच्चे सपूत कहाना

- रेखा श्रीवास्तव

सोमवार, 25 अगस्त 2008

"मौसम" पर एक कविता

सूरज तपता, धरती जलती
गरम हवा जोरों से चलती
तन से बहुत पसीना बहता
हाथ सभी के पंखा रहता
आरे बादल, काले बादल
गरमी दूर भगा रे बादल
रिमझिम बूँदें बरसा बादल
झम-झम पानी बरसा बादल
ले घनघोर घटायें छाईं
टप-टप, टप-टप बूँदें आईं
बिजली लगी चमकने चम्-चम्
लगा बरसने पानी झम-झम
लेकर अपने साथ दिवाली
सरदी आई बड़ी निराली
शाम सवेरे सरदी लगती
पर स्वेटर से है वह भगती।